शिमला। हिमाचल प्रदेश के शांत पहाड़ों में मौसम भले ही सर्द हो, लेकिन राज्य की सियासत का पारा अचानक चढ़ गया है। आगामी विधानसभा बजट सत्र से ठीक पहले कांग्रेस सरकार और संगठन के भीतर सुगबुगाहट तेज हो गई है। मुद्दा वही पुराना है, लेकिन संदर्भ नया है— सुक्खू सरकार अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे कर चौथे साल में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन मंत्रिमंडल में खाली पड़ा एक पद अब तक नहीं भरा जा सका है।

 

सरकार के अंतिम दो वर्षों के कार्यकाल को देखते हुए अब 'करो या मरो' वाली स्थिति है। यही कारण है कि बजट सत्र से पहले कैबिनेट विस्तार, बोर्ड-निगमों में ताजपोशी और संगठन के पेंच कसने की कवायद शुरू हो गई है। कैबिनेट रैंक और लाल बत्ती की चाहत रखने वाले नेताओं में गजब की छटपटाहट देखने को मिल रही है।

तीन साल का इंतजार और 'एक पद' की पहेली

प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता संभाले तीन साल का लंबा वक्त बीत चुका है। इस दौरान कई बार चर्चाएं उठीं और ठंडी हो गईं, लेकिन सुक्खू कैबिनेट का स्वरूप अब तक अधूरा है। एक मंत्री पद रिक्त होने से न केवल क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो रहा है, बल्कि दावेदारों का धैर्य भी अब जवाब देने लगा है।

 

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अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चौथे वर्ष में है और शेष समय दो साल से भी कम बचा है, तो 'एडजस्टमेंट' की राजनीति उफान पर है। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर अब पद नहीं मिले, तो फिर कब मिलेंगे? इसी दबाव के चलते बजट सत्र से पहले नियुक्तियों का पिटारा खुलने की प्रबल संभावना बन गई है।

दिल्ली में दिग्गजों का जमावड़ा: क्या मिला 'ग्रीन सिग्नल'?

इस सियासी हलचल का केंद्र फिलहाल शिमला से शिफ्ट होकर नई दिल्ली बन गया है। गणतंत्र दिवस समारोह के तुरंत बाद राज्य के शीर्ष नेतृत्व को दिल्ली तलब किया गया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार से केंद्रीय नेतृत्व के साथ अलग-अलग बैठकों में कैबिनेट विस्तार, राजनीतिक नियुक्तियों और संगठन के ढांचे को लेकर चर्चा हुई। इन बैठकों के बाद यह साफ संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में कुछ बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।

 

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बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने एआईसीसी (AICC) संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ लंबी मंत्रणा की है। वहीं हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष (HPCC) विनय कुमार ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से अलग मुलाकात कर संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा की। सूत्रों का दावा है कि इन बैठकों का मुख्य एजेंडा मंत्रिमंडल के रिक्त पद को भरना, विधानसभा उपाध्यक्ष की नियुक्ति और बोर्ड-निगमों में अध्यक्ष व उपाध्यक्षों की तैनाती कर असंतुष्टों को साधना था। हाईकमान ने भी मिशन मोड में काम करने और क्षेत्रीय व जातीय समीकरण साधने के निर्देश दिए हैं।

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दौड़ में कौन? कांगड़ा बनाम कुल्लू की लड़ाई

कैबिनेट में खाली एक कुर्सी के लिए कई दिग्गज लाइन में हैं। समीकरणों को देखें तो मुकाबला कड़ा है: प्रदेश का सबसे बड़ा जिला कांगड़ा अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है। यहां से विधायक संजय रत्न और पालमपुर के विधायक आशीष बुटेल का नाम सबसे आगे चल रहा है। वहीं वरिष्ठता के आधार पर कुल्लू से विधायक सुंदर ठाकुर भी मंत्री पद की रेस में मजबूती से डटे हुए हैं। मंत्री पद के अलावा विधानसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली है। माना जा रहा है कि जो नेता मंत्री नहीं बन पाएंगे, उन्हें इस संवैधानिक पद या किसी बड़े निगम की जिम्मेदारी देकर संतुष्ट किया जा सकता है।

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पंचायत चुनाव से पहले टीम तैयार करना चुनौती

सत्ता और संगठन के बीच तालमेल बैठाना बड़ी चुनौती है। विनय कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बने डेढ़ महीना हो चुका है, लेकिन उनकी टीम (प्रदेश कार्यकारिणी) अब तक नहीं बन पाई है। अभी तक केवल जिला अध्यक्षों की नियुक्ति हुई है, जबकि ब्लॉक और पीसीसी (PCC) डेलीगेट्स की सूची लंबित है। पार्टी नेतृत्व साफ कर चुका है कि आगामी पंचायत चुनावों से पहले संगठन का पूरा ढांचा खड़ा करना अनिवार्य है। ऐसे में बजट सत्र से पहले सरकार और संगठन, दोनों मोर्चों पर बड़ी सूचियां जारी हो सकती हैं।

 

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