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January 29, 2026
हिमाचली सेब बागवानों को खत्म करने पर तुले पीएम मोदी, अब 27 देशों की घटाई सेब इंपोर्ट ड्यूटी
EU से हुआ समझौता, 50 से सीधे 20 फीसदी कर दी इम्पोर्ट ड्यूटी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की रीढ़ कही जाने वाली 5500 करोड़ रुपये की सेब आर्थिकी पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा गया है। केंद्र की मोदी सरकार ने हिमाचल के लाखों बागवानों को करारा झटका देते हुए न्यूजीलैंड के बाद अब यूरोपीय यूनियन (EU) के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
बुधवार को हुए इस समझौते के तहत विदेशी सेब पर लगने वाली इम्पोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) को 50% से घटाकर मात्र 20% कर दिया गया है। यह फैसला हिमाचल के उन बागवानों के लिए किसी "वज्रपात" से कम नहीं है, जो वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वादे के पूरा होने की आस लगाए बैठे थे, जिसमें उन्होंने विदेशी सेब पर ड्यूटी बढ़ाने की बात कही थी।
हिमाचल के बागवानों में इस समय मोदी सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है। बागवानों को वह दिन याद आ रहा है जब 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हमीरपुर के सुजानपुर में आयोजित रैली में नरेंद्र मोदी ने गरजते हुए कहा था कि वे हिमाचली सेब को बचाने के लिए विदेशी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50% से बढ़ाकर 100% करेंगे। लेकिन सत्ता में आने के 10 साल बाद हकीकत इसके ठीक उलट है। बागवानों का कहना है कि ड्यूटी बढ़ाना तो दूर, मोदी सरकार ने विदेशी सेब के लिए भारत के दरवाजे पूरी तरह खोलकर हिमाचल की आजीविका को संकट में डाल दिया है।
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FTA के लागू होते ही यूरोपीय देशों से बड़ी मात्रा में सस्ता सेब भारतीय बाजारों में पहुंचेगा। समझौते के अनुसार शुरुआती चरण में करीब 50 हजार टन सेब आयात किया जाएगा, जो अगले 10 वर्षों में बढ़कर एक लाख टन प्रतिवर्ष तक पहुंच सकता है। इन सेबों पर केवल 20 फीसदी शुल्क लगेगा और न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये प्रति किलो तय किया गया है। इससे पहले केंद्र सरकार न्यूजीलैंड के सेब पर भी इम्पोर्ट ड्यूटी घटा चुकी है। बागवानों का कहना है कि लगातार ड्यूटी कम किए जाने से देशी सेब की प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन हो जाएगी।
हिमाचल में विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सेब उत्पादन की लागत काफी अधिक है। यहां प्रति किलो सेब तैयार करने में औसतन 27 रुपये तक खर्च आता है। बागवानों को तभी मुनाफा मिलता है, जब बाजार में सेब 50 से 100 रुपये प्रति किलो बिके। इसके उलट न्यूजीलैंड, चीन, अमेरिका और ईरान जैसे देशों में प्रति हेक्टेयर पैदावार 40 से 70 मीट्रिक टन तक होती है, जबकि हिमाचल में यह मात्र 7 से 8 मीट्रिक टन के आसपास है।
बागवानों का कहना है कि इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात हिमाचल प्रदेश के भाजपा नेताओं की चुप्पी है। जब केंद्र सरकार राज्य की मुख्य आर्थिकी पर प्रहार कर रही है, तब प्रदेश के भाजपा नेता और सांसद मौन धारण किए हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है: हिमाचल के हितों की रक्षा करने के बजाय, राज्य के भाजपा नेता आलाकमान के फैसले के खिलाफ एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। यह चुप्पी बागवानों के साथ हो रहे अन्याय में उनकी मूक सहमति को दर्शाती है।
इस फैसले के बाद से हिमाचल में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। प्रोग्रेसिव ग्रोअर एसोसिएशन के अध्यक्ष लोकेंद्र बिष्ट ने इसे हिमाचल के सेब के अस्तित्व के लिए खतरा बताया है। उन्होंने कहा कि विदेशी सेब अब थोक में आएगा और हमारे स्थानीय उत्पाद को कोई नहीं पूछेगा। ठियोग से कांग्रेस विधायक कुलदीप सिंह राठौर ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने ठान लिया है कि हिमाचल के सेब उद्योग को खत्म करना है। पहले न्यूजीलैंड और अब यूरोप यह ढाई लाख से ज्यादा परिवारों की रोजी.रोटी पर सीधा हमला है। हैरानी है कि भाजपा के नेता केंद्र के सामने यह मसला उठाने के बजाय तमाशबीन बने हुए हैं।