कुल्लू/मंडी। देव संस्कृति और आस्था के लिए प्रसिद्ध हिमाचल प्रदेश में देवी-देवताओं की परंपराएं आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यहां सदियों से चली आ रही देव व्यवस्था केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और सामाजिक संतुलन को बनाए रखने का भी संदेश देती है।
माता फुंगणी की भविष्यवाणी
इसी कड़ी में कुल्लू और मंडी जिले की सीमा पर स्थित धार क्षेत्र में आयोजित ऐतिहासिक धारा रा काहिका उत्सव में माता फुंगणी ने गुर के माध्यम से ऐसा संदेश दिया- जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
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माता ने जताई गहरी नाराजगी
देववाणी के दौरान माता फुंगणी ने पवित्र देव स्थलों पर बढ़ती मानवीय दखलंदाजी और प्राकृतिक स्थानों के साथ हो रही छेड़छाड़ पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। माता का संदेश था कि जिन स्थानों को सदियों से देव आस्था का केंद्र माना जाता है, उन्हें पर्यटन या व्यावसायिक गतिविधियों का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
देव स्थलों को ना बनाएं टूरिस्ट स्पॉट
उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि अगर इंसान अपनी सीमाएं लांघकर इन पवित्र स्थलों की गरिमा को नुकसान पहुंचाएगा- तो इसका दुष्परिणाम पूरी मानव जाति को भुगतना पड़ सकता है।
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पवित्रता बनाए रखने का आह्वान
उत्सव के दौरान माता फुंगणी के कारदार राम लाल ठाकुर ने श्रद्धालुओं को देव संदेश से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि माता ने विशेष रूप से कहा है कि पर्वतीय देवस्थलों और प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूल पहचान और पवित्रता को किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। आधुनिक विकास और पर्यटन के नाम पर इन स्थानों के स्वरूप में अनावश्यक बदलाव करना देव परंपराओं के विपरीत माना जाएगा।
देव स्थलों की गरिमा बनाए रखें
उन्होंने कहा कि देव संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और धार्मिक मर्यादाओं के पालन की भी सीख देती है। इसलिए सभी लोगों का कर्तव्य है कि वे इन स्थानों का सम्मान करें और उनकी गरिमा बनाए रखें।
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जोत पर छोड़े पशुओं को हटाने का निर्देश
देववाणी के दौरान माता फुंगणी ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने पवित्र जोतों और देवस्थलों के आसपास अपनी गाय-भैंसों को खुला छोड़ रखा है, वे उन्हें तुरंत वहां से वापस ले जाएं।
समाज के लिए भी अशुभ
माता के अनुसार ऐसे स्थान विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं और वहां इस प्रकार की गतिविधियां उचित नहीं मानी जातीं। अगर इस निर्देश की अनदेखी की गई तो इसका असर केवल संबंधित लोगों पर ही नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर समाज के लिए भी अशुभ माना जाएगा।
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देव नीति अपनाने वालों पर बनी रहेगी कृपा
माता ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हुए यह भी संदेश दिया कि यदि लोग देव नीति और पारंपरिक मर्यादाओं के अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे, तो क्षेत्र में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि प्रकृति और देव परंपराओं का सम्मान करने वाले लोगों पर सदैव देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। वहीं अगर इन नियमों की लगातार अवहेलना की गई तो भविष्य में प्राकृतिक और सामाजिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
देव समाज में विशेष महत्व रखता है धारा रा काहिका
धारा रा काहिका उत्सव को देव समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरा के अनुसार सावन मास में सबसे पहले इसी स्थान पर काहिका का आयोजन होता है। इसके बाद ही कुल्लू की लगघाटी और मंडी क्षेत्र के अन्य इलाकों में काहिका उत्सव आयोजित किए जाते हैं। इस वजह से इस आयोजन को देव परंपरा की दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है।
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आशीर्वाद लेने पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु
इस वर्ष भी उत्सव में माता फुंगणी, देवता पंचाली नारायण, दलीघाट की माता, चौहारघाटी की माता फुंगणी सहित विभिन्न देवी-देवताओं के प्रतिनिधियों और कारकूनों ने पूरे विधि-विधान के साथ धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन किया। देव आदेशों का पालन पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल हुए।
पुजारियों-कारकूनों ने निभाई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
इस पवित्र आयोजन को सफल बनाने में पंडित अतुल शर्मा, कुबेर शर्मा और कालू राम नड़ सहित अन्य देव कारकूनों और पुजारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धार्मिक परंपराओं के अनुसार सभी अनुष्ठानों को संपन्न कराया गया और देव समाज की सदियों पुरानी परंपराओं का पालन सुनिश्चित किया गया।
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विदित रहे कि, धारा रा काहिका केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष इस आयोजन में देवी-देवताओं के संदेशों को श्रद्धालु अत्यंत गंभीरता से सुनते और अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।
