#विविध
July 19, 2026
हिमाचल की इस पंचायत का बड़ा फैसला : शादी में सिर्फ मंगलसूत्र, नथ और झुमके पहनेंगी दुल्हन
बारात में अधिकतम 10 वाहन ही शामिल किए जा सकेंगे।
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सिरमौर। बदलते समय के साथ शादी-विवाह में बढ़ता दिखावा और फिजूलखर्ची अब कई परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। महंगे आभूषण, बड़ी बारात, रस्मों के नाम पर होने वाले अतिरिक्त खर्च और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के कारण कई परिवार कर्ज तक लेने को मजबूर हो जाते हैं।
इसी बढ़ती समस्या को देखते हुए सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र की ग्राम पंचायत सखोली ने सामाजिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। पंचायत ने सर्वसम्मति से ऐसी नियमावली लागू की है, जिसका उद्देश्य विवाह समारोहों को सादगीपूर्ण, किफायती और सामाजिक रूप से संतुलित बनाना है।
ग्राम पंचायत का मानना है कि यदि इन नियमों का पालन ईमानदारी से किया गया तो शादी-विवाह में होने वाले अनावश्यक खर्च पर रोक लगेगी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत मिलेगी और समाज में दिखावे की होड़ भी कम होगी।
पंचायत प्रधान कमलेश कुमार और उपप्रधान सुरेंद्र शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित ग्राम सभा की बैठक में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में मौजूद ग्रामीणों ने विवाह समारोहों में बढ़ते खर्च और बदलती सामाजिक प्रवृत्तियों पर चिंता जताई।
लंबी चर्चा के बाद ग्राम सभा ने सर्वसम्मति से नई नियमावली को मंजूरी दी। पंचायत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाकर नहीं, बल्कि पूरे समाज के हित और आने वाली पीढ़ियों को आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से लिया गया है।
नई नियमावली के तहत विवाह के दौरान दुल्हन केवल आवश्यक पारंपरिक आभूषण ही धारण करेगी। पंचायत ने तय किया है कि दुल्हन मंगलसूत्र, नाक की नथ या तीली तथा कानों में झुमके पहन सकेगी।
इसके अलावा भारी मात्रा में सोने-चांदी के आभूषण पहनने की परंपरा को हतोत्साहित किया जाएगा। पंचायत का मानना है कि महंगे गहनों का प्रदर्शन सामाजिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
ग्राम सभा ने विवाह समारोहों में वर्षों से चली आ रही 'मामा खर्च' की परंपरा में भी बड़ा बदलाव किया है। नए नियमों के अनुसार अब विवाह की रस्मों में केवल सगा मामा ही अपनी पारंपरिक भूमिका निभाएगा।
चाचा, ताऊ या अन्य रिश्तेदारों द्वारा मामा के नाम पर किए जाने वाले अतिरिक्त लेन-देन और खर्च पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। पंचायत का कहना है कि इस परंपरा के कारण कई परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव पड़ता था।
नई व्यवस्था के तहत रिश्ता तय होने के अवसर पर आयोजित होने वाले मांस और मदिरा के भोज भी बंद किए जाएंगे। पंचायत ने माना कि इस तरह के आयोजनों में अनावश्यक खर्च होता है और कई बार सामाजिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है।
इसी तरह विवाह के बाद निभाई जाने वाली 'पलटोज' और 'ताते' ले जाने जैसी परंपराओं को भी समाप्त करने का फैसला लिया गया है- ताकि परिवारों को अतिरिक्त खर्च से बचाया जा सके।
विवाह समारोहों में वाहनों की लंबी कतारें भी अब सखोली पंचायत में देखने को नहीं मिलेंगी। पंचायत ने तय किया है कि बारात में अधिकतम 10 वाहन ही शामिल किए जा सकेंगे। पंचायत का मानना है कि इससे न केवल विवाह का खर्च कम होगा, बल्कि यातायात संबंधी समस्याओं और ईंधन की अनावश्यक खपत पर भी नियंत्रण रहेगा।
नई नियमावली को केवल कागजों तक सीमित न रहने देने के लिए पंचायत ने सख्त दंड का भी प्रावधान किया है। यदि कोई व्यक्ति या परिवार पंचायत द्वारा तय किए गए नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर 51 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
इसके अलावा संबंधित परिवार को पूरी पंचायत के लिए सामूहिक भोज भी आयोजित करना होगा। यदि परिवार ऐसा नहीं करता तो पंचायत स्तर पर सामाजिक कार्रवाई की जाएगी। पंचायत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे परिवार के किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में पंचायत का कोई सदस्य भाग नहीं लेगा।
पंचायत प्रधान कमलेश कुमार ने कहा कि इस निर्णय का उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाना नहीं है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई और विवाह समारोहों में बढ़ते खर्च के कारण आम परिवार आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पंचायत चाहती है कि शादी-विवाह खुशियों का अवसर बने, आर्थिक बोझ का नहीं। इसी सोच के साथ यह नियमावली तैयार की गई है ताकि समाज में सादगी, समानता और आपसी सहयोग की भावना मजबूत हो सके।
स्थानीय लोगों ने पंचायत के इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है। उनका मानना है कि अगर इस तरह के प्रयास अन्य पंचायतों में भी शुरू होते हैं तो विवाह समारोहों में दिखावे की प्रवृत्ति कम होगी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
ग्रामीणों का कहना है कि शादी जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार है। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता बनाने के बजाय सादगी और पारिवारिक मूल्यों के साथ मनाया जाना चाहिए। पंचायत को उम्मीद है कि आने वाले समय में यह पहल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बनेगी और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करेगी।