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July 19, 2026

हिमाचल : एक साल में नई जीप का रंग पड़ा फीका, ग्राहक पहुंचा कोर्ट- अब मिला 40 हजार मुआवजा

डीलर ने हर बार ग्राहक को अलग-अलग कारण बताकर वापस भेज दिया

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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में एक नई जीप खरीदने के महज एक साल के भीतर उसका रंग फीका पड़ गया। इस मामले की शिकायत के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने पर एक ग्राहक ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया।

एक साल में नई जीप का रंग पड़ा फीका

आयोग ने वाहन मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए वाहन निर्माता कंपनी और अधिकृत डीलर को जिम्मेदार ठहराया है। मामले की सुनवाई के बाद आयोग ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए वाहन निर्माता कंपनी और अधिकृत डीलर को पीड़ित को 40 हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए।

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ग्राहक ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता की गाड़ी के बोनट और छत पर खराब हुए पेंट को दोबारा ठीक कराया जाए- ताकि वाहन को उसकी मूल स्थिति में लाया जा सके। इसके साथ ही मानसिक उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये और मुकदमे की पैरवी में हुए खर्च के लिए 15 हजार रुपये देने के निर्देश भी दिए गए हैं। इस प्रकार कंपनी और डीलर को कुल 40 हजार रुपये का भुगतान शिकायतकर्ता को करना होगा।

खरीद के एक साल में सामने आई पेंट की समस्या

मामला शिमला जिले के जुब्बल क्षेत्र के निवासी संजीव सीहता का है। उन्होंने सितंबर 2020 में अधिकृत डीलरशिप से नई जीप खरीदी थी। वाहन खरीदते समय उन्हें भरोसा था कि नई गाड़ी कई वर्षों तक बिना किसी बड़ी परेशानी के चलेगी, लेकिन उनकी यह उम्मीद ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी।

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पैच और धब्बे दिखने लगे

शिकायत के अनुसार, वाहन खरीदने के लगभग एक वर्ष के भीतर ही उसके बोनट और छत का रंग अपनी चमक खोने लगा। शुरुआत में हल्का बदलाव दिखाई दिया, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति ऐसी हो गई कि इन हिस्सों पर पेंट फीका पड़ने के साथ-साथ अलग-अलग स्थानों पर पैच और धब्बे भी साफ नजर आने लगे।

शिकायत के बावजूद नहीं मिला समाधान

शिकायतकर्ता ने वाहन में आई इस खराबी की जानकारी कई बार डीलर को दी। उनका कहना था कि उन्होंने उम्मीद की थी कि वारंटी के तहत इस दोष को बिना किसी परेशानी के ठीक कर दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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कंपनी ने नहीं दिया ध्यान

आरोप है कि हर बार उन्हें अलग-अलग कारण बताकर वापस भेज दिया गया। कभी समस्या को मामूली बताया गया तो कभी अन्य वजहों का हवाला दिया गया। समय बीतता गया, लेकिन वाहन की खराबी जस की तस बनी रही।

ग्राहक के हक में फैसला

आखिरकार लगातार निराशा मिलने के बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। आयोग में सुनवाई के दौरान वाहन निर्माता कंपनी ने कहा कि यह विवाद मुख्य रूप से ग्राहक और डीलर के बीच का है तथा कंपनी की इसमें प्रत्यक्ष जिम्मेदारी नहीं बनती।

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नहीं करूंगा मुफ्त में ठीक

वहीं, अधिकृत डीलर ने अपना पक्ष रखते हुए दावा किया कि वाहन की तकनीकी जांच कराई गई थी। जांच के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि पेंट का खराब होना किसी बाहरी कारण या रासायनिक प्रभाव का परिणाम है। डीलर का कहना था कि इस प्रकार की क्षति वाहन की वारंटी के दायरे में शामिल नहीं होती, इसलिए उसे मुफ्त में ठीक करने का सवाल नहीं उठता।

आयोग ने मांगे दावों के समर्थन में प्रमाण

मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों के साथ उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड का भी गहन परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि कंपनी और डीलर ने यह तो कहा कि पेंट बाहरी कारणों से खराब हुआ है। मगर अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

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तकनीकी निरीक्षण का उल्लेख जरूर किया गया। मगर निरीक्षण करने वाले विशेषज्ञ का शपथ-पत्र, विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट या ऐसा कोई प्रमाण आयोग के समक्ष पेश नहीं किया गया- जिससे यह साबित हो सके कि वाहन में आई खराबी निर्माण संबंधी दोष नहीं थी।

उपभोक्ता के दावे को खारिज नहीं किया

आयोग ने माना कि केवल मौखिक दलीलों के आधार पर उपभोक्ता के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। अध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून का उद्देश्य ग्राहकों को दोषपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा प्रदान करना है।

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कंपनी और डीलर की जिम्मेदारी

अगर कोई उपभोक्ता वारंटी अवधि के भीतर वाहन में आई खराबी की शिकायत करता है तो संबंधित कंपनी और डीलर की जिम्मेदारी है कि वह उसका समय पर और संतोषजनक समाधान सुनिश्चित करें। आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता को अपेक्षित सेवा नहीं मिली और उसे अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ा। ऐसे में मानसिक पीड़ा और समय की बर्बादी के लिए उसे उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

पेंट दोबारा करने और 40 हजार रुपये देने के आदेश

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद आयोग ने वाहन निर्माता कंपनी और अधिकृत डीलर को निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता की जीप के बोनट और छत का पेंट दोबारा कराकर खराबी दूर की जाए। इसके अतिरिक्त मानसिक उत्पीड़न के लिए 25 हजार रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 15 हजार रुपये शिकायतकर्ता को अदा किए जाएं।

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