कांगड़ा। आज भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतें मुख्यतः विकास कार्यों तक सीमित हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद में सरपंच की हैसियत किसी न्यायाधीश से कम नहीं होती थी।
जज के बराबर था सरपंच
ब्रिटिश शासन से पहले यहां की सामाजिक व्यवस्था गांव स्तर पर ही अनुशासित और स्वशासित थी, जिसमें पंचायतें न केवल प्रशासनिक बल्कि न्यायिक जिम्मेदारी भी निभाती थीं। पंचायतें विवाह विवाद, जमीन बंटवारा, पशु चोरी, पारिवारिक झगड़े जैसे कई मामलों में अंतिम निर्णय देती थीं और उनके फैसले को सामाजिक रूप से बाध्यकारी माना जाता था।
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गांव के लिए गौरव का पल
इस गौरवपूर्ण ग्रामीण व्यवस्था की ऐतिहासिक झलक उस समय के ब्रिटिश भारतीय सेवा के वरिष्ठ अधिकारी लियोनार्ड मिडलटन की लिखी पुस्तक ‘कस्टमरी लॉ ऑफ कांगड़ा डिस्ट्रिक्ट’ में मिलती है। यह पुस्तक कांगड़ा की स्थानीय परंपराओं, सामाजिक रीति-रिवाजों और ग्राम स्तर की न्यायिक व्यवस्था का विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करती है।
कांगड़ा की परंपराएं बनीं ब्रिटिश कानून का आधार
लियोनार्ड मिडलटन को 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कांगड़ा जिले की लैंड सेटलमेंट प्रक्रिया, भूमि रिकॉर्डिंग और कराधान प्रणाली का अध्ययन करने के लिए नियुक्त किया गया था। इसी कार्य के दौरान उन्होंने कांगड़ा की गहन सामाजिक और जातीय संरचना को समझा और स्थानीय न्याय परंपराओं को एक कानूनी दस्तावेज का रूप दिया।
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उत्तराधिकार और विवाह प्रथा
मिडलटन की पुस्तक में दर्ज कई महत्वपूर्ण तथ्य आज भी समाजशास्त्र और विधिशास्त्र के शोधकर्ताओं के लिए आधारभूत माने जाते हैं। मसलन-
- कांगड़ा के कुछ स्वर्ण (ऊंची जाति) समुदायों में भूमि उत्तराधिकार केवल पुत्रों तक सीमित था।
- यदि परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो, तो महिलाओं को सीमित संपत्ति अधिकार दिए जाते थे, वह भी सामूहिक सहमति से।
- विवाह को सामाजिक अनुबंध माना जाता था।
- पूर्व निर्धारित आयु, जातिगत मर्यादा, दहेज प्रथा और सामुदायिक सहमति विवाह के मूल आधार थे।
- विधवा विवाह केवल कुछ जातियों में ही मान्य था, जबकि अधिकांश समुदायों में इसे सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती थी।
- गांवों में पंच परमेश्वर की सत्ता और तत्काल न्याय
- पंचायतों की भूमिका केवल सामाजिक नहीं, बल्कि न्यायिक सत्ता के रूप में भी प्रभावी थी।
- जमीन के बंटवारे के विवाद पंचायत तय करती थी।
- पशु चोरी या सामाजिक अपमान के मामलों में पंचायत सजा सुनाती थी।
- निर्णय आम सहमति से लिए जाते थे और पूरे समुदाय के सामने सुनाए जाते थे।
- फैसलों में अक्सर जुर्माना, सार्वजनिक क्षमायाचना, या सामाजिक बहिष्कार जैसे दंड दिए जाते थे।
- इस तरह की न्यायिक प्रक्रिया ने गांव स्तर पर ही तत्काल और सस्ता न्याय सुलभ करवाया, जिससे लोगों को अदालतों की ओर नहीं भागना पड़ता था।
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पुस्तक बनी कानूनी रीढ़
लियोनार्ड मिडलटन की पुस्तक सिर्फ एक इतिहास दस्तावेज नहीं रही, बल्कि ब्रिटिश प्रशासन ने इस ‘कस्टमरी लॉ’ को विधिवत मान्यता देकर कानूनी ढांचे में शामिल किया। इसके आधार पर-
- कांगड़ा में भूमि वितरण और कर निर्धारण की नीतियां बनीं।
- ब्रिटिश अधिकारी स्थानीय विवादों के समाधान में इसी कस्टमरी लॉ को संदर्भ के रूप में देखने लगे।
- यह दस्तावेज औपनिवेशिक शासन को स्थानीय समाज से जोड़ने का सेतु भी बना।
