शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सुक्खू सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के सेवा विस्तार और पुनर्नियुक्ति पर सख्त रोक लगाने के आदेश जारी किए जाने के कुछ ही घंटों बाद अफसरशाही ने इन निर्देशों की अनदेखी कर दी। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सरकार के आदेशों को न तो गंभीरता से लिया जा रहा है और न ही उनका सख्ती से पालन हो रहा है।

 

मंगलवार को दिन के समय मुख्य सचिव ने सभी प्रशासनिक सचिवों को स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि अब किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को सेवा विस्तार, पुन: रोजगार या पुनर्नियुक्ति नहीं दी जाएगी। यहां तक कि ऐसे किसी भी प्रस्ताव को किसी स्तर पर स्वीकार न करने की बात भी आदेशों में कही गई थी।

शाम होते ही आदेशों की अनदेखी

हालांकि, इन सख्त निर्देशों के जारी होने के कुछ ही घंटों बाद मामला उलटता नजर आया। अतिरिक्त मुख्य सचिव, लोक निर्माण विभाग द्वारा SDO मंस राम को छह महीने की पुनर्नियुक्ति दिए जाने का आदेश जारी कर दिया गया। यह आदेश अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।

 

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अफसरशाही पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमाचल की अफसरशाही सरकार के निर्देशों को गंभीरता से लेती भी है या नहीं। इतना ही नहीं, यह भी चर्चा में है कि वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों का भी पालन नहीं हो रहा, जिससे प्रशासनिक समन्वय पर असर पड़ रहा है।

पारदर्शिता के दावे पर भी प्रश्न

सरकार ने अपने आदेश में साफ कहा था कि यह फैसला सेवा प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए लिया गया है। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया था कि जो अधिकारी पहले से सेवा विस्तार पर हैं, उन्हें अवधि पूरी होने के बाद स्वतः सेवानिवृत्त माना जाएगा।

 

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पहले भी उठते रहे हैं सवाल

गौरतलब है कि इससे पहले भी सरकार पर अपने पसंदीदा अधिकारियों को सेवा विस्तार देने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में ताजा घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। अब देखना होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं। फिलहाल, यह मामला प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और शासन के बीच तालमेल पर बड़ा सवाल बनकर उभरा है।

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