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May 22, 2026
हिमाचल में कैसे मिलेगा युवाओं को रोजगार... शुरू ही नहीं हो पाए 421 उद्योग; सरकारी नीतियां बनी बाधा!
421 उद्योगों में लाखों युवाओं को मिलना था रोजगार, करोड़ों का निवेश भी हुआ प्रभावित
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में औद्योगिक विकास और निवेश को लेकर किए जा रहे बड़े-बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। प्रदेश के हजारों युवा रोजगार की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन जिन उद्योगों से उन्हें नौकरियां मिलने की आस थी, उनमें से सैकड़ों परियोजनाएं वर्षों बाद भी धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। उद्योग विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 421 उद्योग ऐसे हैं जो विभिन्न कारणों से अब तक शुरू नहीं हो सके हैं। इसका सीधा असर निवेश, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन पर पड़ रहा है।
प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रस्तावित उद्योगों से हजारों युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद थी। उद्योग स्थापित होने पर स्थानीय युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने थे, लेकिन परियोजनाओं के लटकने से रोजगार की संभावनाएं भी ठहर गई हैं। औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास रहने वाले युवाओं का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि नए उद्योग खुलने से नौकरी के लिए प्रदेश से बाहर नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन लंबे इंतजार के बावजूद हालात नहीं बदले हैं।
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उद्योग विभाग के दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में सबसे अधिक निष्क्रिय या शुरू न हो पाए उद्योग कांगड़ा, सोलन और ऊना जिलों में हैं। कांगड़ा में 128, सोलन में 110 और ऊना में 83 उद्योग विभिन्न कारणों से बंद या निष्क्रिय पड़े हैं। इसके अलावा बिलासपुर में 59, शिमला में 16, मंडी में 13, सिरमौर में 6, लाहौल-स्पीति में 4 तथा कुल्लू में 2 उद्योग अब तक गति नहीं पकड़ सके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन परियोजनाओं को समय पर शुरू किया जाता तो प्रदेश में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बड़ा बढ़ावा मिल सकता था।
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उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिक माहौल कई कारणों से प्रभावित हुआ है। उद्योगपतियों का आरोप है कि सरकार की नीतियों में बार-बार बदलाव, करों का बढ़ता बोझ, वित्तीय संस्थानों से ऋण प्राप्त करने में कठिनाई, बिजली दरों में वृद्धि और परिवहन लागत बढ़ने से उद्योग स्थापित करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
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राजनीतिक हलकों में भी यह चर्चा तेज है कि राज्य सरकार की कुछ नीतियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने निवेशकों की गति को प्रभावित किया है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि सुक्खू सरकार निवेश आकर्षित करने और लंबित परियोजनाओं को धरातल पर उतारने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई है।
ऊना जिले के जीतपुर बेहड़ी में करीब चार वर्ष पहले 500 करोड़ रुपये की लागत से इथेनॉल प्लांट स्थापित करने की योजना बनाई गई थी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए 30 एकड़ भूमि भी आवंटित कर दी गई थी, लेकिन आज तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है।
उद्योग विभाग की ओर से संबंधित कंपनी को कई बार नोटिस जारी किए जा चुके हैं, लेकिन परियोजना को लेकर अब तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। यदि यह प्रोजेक्ट शुरू होता तो क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के अवसर पैदा हो सकते थे।
उद्योग संगठनों का कहना है कि कई निवेशक वित्तीय संस्थानों की जटिल प्रक्रियाओं से परेशान हैं। एक उद्योगपति द्वारा उद्योग स्थापित करने के लिए महीनों तक बैंक के चक्कर लगाने के बाद भी ऋण स्वीकृत न होने का मामला निवेशकों की चुनौतियों को उजागर करता है। उद्योग जगत का मानना है कि यदि वित्तीय सहायता समय पर उपलब्ध न हो तो नई परियोजनाओं को शुरू करना और मौजूदा इकाइयों को संचालित रखना दोनों मुश्किल हो जाते हैं।
उद्योग विभाग अब लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में है। विभाग की ओर से उन उद्योगों को नोटिस जारी किए जा रहे हैं जिन्होंने भूमि आवंटन के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं किया या उत्पादन नहीं किया। अधिकारियों का कहना है कि जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
एक ओर जहां सैकड़ों उद्योग शुरू नहीं हो पाए हैं, वहीं दूसरी ओर चल रहे उद्योग भी परिवहन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दिल्ली में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल का असर बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) औद्योगिक क्षेत्र पर भी दिखाई दिया है। दिल्ली के लिए माल ढुलाई प्रभावित होने से उद्योगों का तैयार सामान फैक्ट्रियों में ही फंस गया है। उद्योग संगठनों का कहना है कि यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है और कई इकाइयों को अस्थायी रूप से उत्पादन कम करना पड़ सकता है।