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April 7, 2026

विक्रमादित्य का विभाग बिन पैसों के हुआ अपाहिज, 20 विस क्षेत्रों की 224 सड़कों का लटका निर्माण

224 सडक़ों को मिली एफआरए की अनुमति, कुछ की डीपीआर नाबार्ड को भेजी

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Vikramaditya Singh department

शिमला। हिमाचल प्रदेश में सड़क विकास की रफ्तार इन दिनों बजट की कमी के कारण थमती नजर आ रही है। लोक निर्माण विभाग जिसकी जिम्मेदारी प्रदेश में सड़क नेटवर्क को मजबूत करने की है] वित्तीय संसाधनों के अभाव में लगभग अपाहिज स्थिति में पहुंच गया है। इसका सीधा असर ग्रामीण इलाकों की कनेक्टिविटी पर पड़ रहा है] जहां करीब 224 सड़कों का निर्माण कार्य अधर में लटक गया है।

 

सूत्रों के अनुसार इन सड़कों को बनाने के लिए वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आवश्यक मंजूरियां पहले ही मिल चुकी हैं] लेकिन धन की कमी के चलते न तो प्रशासनिक स्वीकृति मिल पा रही है और न ही व्यय की अनुमति जारी हो रही है। नतीजतन, योजनाएं फाइलों में ही अटकी हुई हैं।

20 विधानसभा क्षेत्रों पर असर

राज्य के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में इन सड़कों का निर्माण प्रस्तावित है। कुसुम्पटी, जुब्बल-कोटखाई, चौपाल, जोगिंद्रनगर, रोहड़ू और रामपुर जैसे इलाकों में सबसे ज्यादा सड़कें लंबित हैं। इसके अलावा मंडी, करसोग, बैजनाथ, ठियोग, शिमला ग्रामीण, अर्की, कांगड़ा और अन्य क्षेत्रों में भी कई परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं।

 

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DPR तैयार, लेकिन काम शुरू नहीं

लोक निर्माण विभाग ने कई सड़कों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर नाबार्ड को भेज दी है, लेकिन फंडिंग की मंजूरी न मिलने से काम आगे नहीं बढ़ पा रहा। कुछ मामलों में प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति की प्रक्रिया शुरू हुई है, मगर अधिकांश परियोजनाएं अभी भी इंतजार में हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर

इनमें से अधिकतर सड़कें ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों से जुड़ी हैं, जहां सड़क निर्माण न होने से स्थानीय लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। खराब भौगोलिक परिस्थितियों में सड़कें ही जीवनरेखा होती हैं, लेकिन बजट की कमी ने इन योजनाओं को रोक दिया है।

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केंद्र से मिली राहत, लेकिन चुनौती बरकरार

हालांकि, केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तीसरे चरण के कार्यों को पूरा करने के लिए समय सीमा बढ़ाकर 31 मार्च 2028 तक कर दी है, जिससे राज्य को कुछ राहत जरूर मिली है। लेकिन जब तक पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं होगा, तब तक इन परियोजनाओं को जमीन पर उतारना मुश्किल बना रहेगा।

विपक्ष को मिला मुद्दा

विकास कार्यों में आ रही इस सुस्ती को लेकर अब राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होने की संभावना है। विपक्ष इसे सरकार की वित्तीय कमजोरी और योजना प्रबंधन की विफलता के रूप में देख रहा है। फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार समय रहते बजट की व्यवस्था कर इन 224 सड़कों के निर्माण को गति दे पाएगी, या फिर ग्रामीण क्षेत्रों के लोग लंबे समय तक बेहतर सड़क सुविधा के इंतजार में ही रहेंगे।

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