#विविध
May 22, 2026
हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : नौकरियां नहीं, बैकडोर सिस्टम चल रहा है- सरकार से मांगा जवाब
42 सरकारी संस्थानों में कुल 17,114 कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर कार्यरत हैं।
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में आउटसोर्स भर्तियों को लेकर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणी की है। हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रदेश में नियमित भर्ती प्रक्रिया के बजाय “बैकडोर सिस्टम” के जरिए नौकरियां बांटी जा रही हैं।
अदालत ने इसे युवाओं के अधिकारों के साथ अन्याय बताते हुए सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब हजारों पद खाली हैं तो नियमित भर्ती क्यों नहीं की जा रही और आउटसोर्स व्यवस्था के जरिए नियुक्तियां किस आधार पर दी जा रही हैं।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य सचिव और प्रधान सचिव (वित्त) को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 16 जून तय की है।
वित्त विभाग के विशेष सचिव सौरभ जस्सल की ओर से अदालत में दायर हलफनामे में कहा गया कि आउटसोर्स कर्मचारियों का डाटा काफी बड़ा है। यह केंद्रीकृत रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए जानकारी जुटाने में समय लग रहा है।
अदालत में प्रस्तुत अधूरे आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 42 सरकारी संस्थानों में कुल 17,114 कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर कार्यरत हैं। इनमें हाईकोर्ट, न्यायिक अकादमी और एडवोकेट जनरल कार्यालय जैसे संस्थान भी शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि वर्ष 2017 की नीति के तहत वित्त विभाग की अनुमति के बिना आउटसोर्स नियुक्तियां संभव नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार के पास इन कर्मचारियों का कोई केंद्रीयकृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
अदालत ने कहा कि मुख्य सचिव को पक्षकार बनाए जाने के बावजूद विभागों का अदालत के आदेशों के प्रति गंभीरता न दिखाना चिंताजनक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना वास्तविक और स्पष्ट आंकड़ों के नीतिगत फैसले लेना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्वास्थ्य विभाग का उदाहरण देते हुए कहा कि 31 जुलाई, 2024 तक स्टाफ नर्सों के 750 पद खाली थे। मगर दिसंबर 2025 में केवल 28 पदों पर नियमित भर्ती निकाली गई। अदालत ने सरकार से यह जानकारी मांगी थी कि उसके बाद कितने नियमित पद भरे गए, लेकिन छह महीने बीतने के बावजूद कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पहले कुछ लोगों को आउटसोर्स के माध्यम से नियुक्त किया जाता है और बाद में रोगी कल्याण समिति के जरिए उन्हें नियमित करने का प्रयास किया जाता है। अदालत ने इसे बैक डोर एंट्री का सुनियोजित तरीका करार दिया।
याचिकाकर्ताओं ने 110 फर्जी सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों की जांच हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी रिटायर्ड जज की निगरानी में मामले की जांच SIT से करवाने की मांग की है। इस पर अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया बिना पारदर्शी प्रक्रिया के 17 हजार से अधिक लोगों को नौकरी देना और उससे आउटसोर्स एजेंसियों को लाभ पहुंचाना बेहद गंभीर मामला प्रतीत होता है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के मद्देनजर पहले मामले की मेरिट पर सुनवाई पूरी की जाएगी।