सिरमौर। आज के दौर में जहां युवा चंद कदम चलने के लिए भी गाड़ी का सहारा लेते हैं, वहीं हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो आधुनिक पीढ़ी को आईना दिखाती है। ये कहानी है 78 साल के बुजुर्ग किसान रूप सिंह की जिनका जज्बा और मेहनत देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाएं। सिरमौर की नाहन तहसील के शेररेशला गांव के रहने वाले रूप सिंह आज भी हर दिन अपने कंधों पर करीब 25 किलो ताजी सब्जियों की टोकरी उठाकर 12 किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता पैदल तय करते हैं।
सिर्फ सफर नहीं, आत्मसम्मान की डगर है
रूप सिंह के लिए ये 12 किलोमीटर की दूरी महज एक रास्ता नहीं, बल्कि उनके स्वाभिमान की पहचान है। कड़कड़ाती ठंड हो या चिलचिलाती धूप, वो अपनी मेहनत की कमाई खाने के लिए हर दिन नाहन शहर पहुंचते हैं। उनके चेहरे की झुर्रियां उनके संघर्ष की गवाह हैं लेकिन उनकी चाल में आज भी वही फुर्ती है जो किसी नौजवान में होनी चाहिए। ताज्जुब की बात ये है कि इस उम्र में भी वो किसी पर बोझ बनने के बजाय अपनी मिट्टी से सोना उपजा रहे हैं और उसे सम्मान के साथ बेच रहे हैं।
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केमिकल नहीं, कुदरत का करिश्मा है उनकी खेती
रूप सिंह की सबसे बड़ी विशेषता उनकी खेती का तरीका है। वे पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक खेती करते हैं। उनके खेतों में ना तो जहरीले कीटनाशक डाले जाते हैं और ना ही कृत्रिम खाद। वे गोबर की खाद और अपने पूर्वजों से विरासत में मिले पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। उनका मानना है कि प्रकृति हर बीमारी का इलाज खुद जानती है। वे कहते हैं- जो प्रकृति में उगता है, उसका समाधान भी प्रकृति के पास ही है। हमें बस उसे समझने की जरूरत है। उनकी उगाई सब्जियां भले ही बाजार की चमकीली सब्जियों जैसी ना दिखें लेकिन वे शुद्धता और सेहत की गारंटी हैं।
युवाओं के लिए कड़ा संदेश: अपनी जड़ें मत छोड़ो
शहर की चकाचौंध और गांवों से होते पलायन पर रूप सिंह काफी चिंतित रहते हैं। उन्होंने आज के युवाओं को एक बहुत ही गहरा संदेश दिया है। उनका कहना है कि शहरों के मोह में आकर अपनी पैतृक जमीन कभी मत बेचो। खेती को छोटा काम ना समझें क्योंकि अपनी जमीन पर पसीना बहाने से ना केवल शरीर मजबूत बनता है बल्कि इंसान मानसिक रूप से भी आजाद रहता है। उनका मानना है कि जब गांव खाली होते हैं तो समाज की नींव कमजोर हो जाती है।
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रिटायर्ड मेजर जनरल ने दुनिया को दिखाई यह 'प्रेरणा'
रूप सिंह की इस अनोखी दिनचर्या और उनके अटूट संघर्ष का एक वीडियो रिटायर्ड मेजर जनरल अतुल कौशिक द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किया गया। वीडियो के सामने आने के बाद लोग इस बुजुर्ग किसान की ऊर्जा और सिद्धांतों के कायल हो गए हैं। ये वीडियो संदेश देता है कि असली ताकत जिम जाने से नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने और ईमानदारी की मेहनत करने से आती है।
78 साल की उम्र में रूप सिंह का ये संघर्ष किसी मजबूरी की उपज नहीं है बल्कि ये उस पहाड़ी संस्कृति का हिस्सा है जहां मेहनत को ही पूजा माना जाता है। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि उम्र महज एक आंकड़ा है, अगर इरादे फौलादी हों तो पहाड़ जैसा रास्ता भी छोटा लगने लगता है।
