#अपराध
August 6, 2026
पढ़ाई के दौरान दोस्तों के दबाव में शुरू किया नशा

बिलासपुर। बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद लेकर हिमाचल के घुमारवीं से बेंगलुरु पढ़ने गया एक युवक आज दूसरों के लिए मिसाल बन गया है। कॉलेज जीवन के दौरान दोस्तों के दबाव में लिया गया एक गलत फैसला उसे नशे की लत तक ले गया।
परिवार की सतर्कता, समय पर इलाज और लगातार काउंसलिंग ने उसे इस दलदल से बाहर निकाल लिया। हालांकि, उसी दौर में नशे की गिरफ्त में आए उसके चार दोस्तों की समय पर उपचार न मिलने के कारण बाद में मौत हो गई।
यह कहानी बताती है कि नशे की शुरुआत अक्सर जिज्ञासा या दोस्तों के दबाव से होती है। मगर समय रहते पहचान और उपचार मिल जाए तो किसी की जिंदगी बचाई जा सकती है। युवक ने बताया कि बंगलूरू पहुंचने के बाद शुरुआत में सब कुछ सामान्य था।
पढ़ाई के साथ नई दोस्ती और नए माहौल में वह धीरे-धीरे ऐसे युवाओं के संपर्क में आया, जो पहले से नशा करते थे। उसने कई बार इससे दूरी बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन लगातार दबाव और जिज्ञासा के चलते एक दिन उसने भी नशा कर लिया। उस वक्त उसे अंदाजा नहीं था कि यह एक बार का प्रयोग धीरे-धीरे उसकी जिंदगी पर हावी हो जाएगा।
कुछ ही समय में नशा उसकी आदत बन गया। घर से पढ़ाई और अन्य जरूरतों के लिए मिलने वाला पैसा नशे पर खर्च होने लगा। जब खर्च बढ़ा तो उसने परिवार से अलग-अलग बहाने बनाकर अतिरिक्त पैसे मांगने शुरू कर दिए।
इसके साथ ही उसके व्यवहार में भी बदलाव आने लगा। परिवार से बातचीत कम हो गई, पढ़ाई में रुचि खत्म होने लगी और मानसिक तनाव लगातार बढ़ता गया। उसकी दिनचर्या और स्वभाव में आए बदलाव ने परिजनों को चिंता में डाल दिया।
परिवार ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए उसे तुरंत घर बुला लिया। चिकित्सकों की सलाह पर उसका इलाज शुरू कराया गया और नियमित काउंसलिंग कराई गई। परिवार का लगातार साथ और स्वयं युवक की इच्छाशक्ति ने धीरे-धीरे उसे नशे की लत से बाहर निकलने में मदद की।
आज वह सामान्य जीवन जी रहा है और युवाओं से अपील करता है कि वे दोस्तों के दबाव में आकर कभी भी नशे की शुरुआत न करें। उसका कहना है कि नशे से बाहर निकलना कठिन जरूर है, लेकिन सही उपचार और सहयोग से यह संभव है।
युवक के अनुसार, कॉलेज के समय छह दोस्तों का एक समूह था और सभी किसी न किसी रूप में नशे की चपेट में आ गए थे। पढ़ाई पूरी होने के बाद सभी अपने-अपने घर लौट गए। इनमें से दो लोगों ने समय रहते इलाज कराया और सामान्य जीवन में लौट आए, लेकिन बाकी चार ने उपचार नहीं कराया।
कुछ वर्षों के भीतर चारों की अलग-अलग समय पर मौत हो गई। युवक कहता है कि आज भी जब उसे अपने दोस्तों की याद आती है तो वह सोचता है कि यदि उन्होंने समय रहते इलाज स्वीकार कर लिया होता तो शायद उनकी जिंदगी भी बच सकती थी।
घुमारवीं के ड्रग इंस्पेक्टर दिनेश गौतम ने बताया कि नशे की रोकथाम के लिए मेडिकल स्टोरों पर सिरिंज और अन्य संवेदनशील दवाओं की बिक्री की नियमित निगरानी की जा रही है। उनका कहना है कि केवल कानूनी कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। परिवार, समाज और प्रशासन को मिलकर जागरूकता और रोकथाम पर समान रूप से काम करना होगा।
स्वास्थ्य विभाग और ड्रग कंट्रोल विभाग ने बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के सिरिंज की बिक्री को लेकर भी निगरानी बढ़ा दी है। हाल ही में घुमारवीं सिविल अस्पताल में दो लोगों द्वारा सिरिंज लेकर भागने की घटना ने भी चिंता बढ़ाई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि नशे की लत व्यक्ति को किस हद तक मजबूर कर सकती है। इसलिए नशे के खिलाफ लड़ाई केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उपचार, काउंसलिंग, पुनर्वास और परिवार के सहयोग को भी समान महत्व देना होगा।