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March 25, 2026

थम गई हिमाचल के हरीश की सांसें, 13 साल तक चला संघर्ष- मां-बाप ने मजबूरी में मांगी थी मौ*त

एक घटना ने बदली परिवार की किस्मत

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Himachal News

नई दिल्ली/कांगड़ा। ये कहानी एक ऐसे संघर्ष की है जिसमें जीत और हार के मायने धुंधले पड़ गए हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर का वो बेटा जो 13 सालों से कोमा की एक ऐसी खामोश दुनिया में कैद था जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं था, आखिरकार अनंत शांति में लीन हो गया। 32 वर्षीय हरीश राणा ने 24 मार्च 2026 की शाम दिल्ली के AIIMS में अपनी अंतिम सांस ली। भारत में 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छामृत्यु) के कानून के तहत जीवन का अंत करने का ये संभवतः पहला और सबसे मार्मिक मामला है।

एक हादसे ने बदली परिवार की किस्मत

हरीश की जिंदगी का दुखद मोड़ 13 साल पहले आया था। चंडीगढ़ में एक PG की चौथी मंजिल से गिरने के कारण वो गंभीर रूप से घायल हो गए और तब से कोमा में थे। मूल रूप से कांगड़ा के रहने वाले उनके पिता अशोक राणा जो बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली आए थे, उनके लिए मानो पहाड़ टूट पड़ा। अगले 13 सालों तक परिवार ने वो सब कुछ किया जो एक माता-पिता अपने बच्चे के लिए कर सकते हैं। इलाज के भारी खर्च को उठाने के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया और गाजियाबाद के एक छोटे से फ्लैट में रहने लगे लेकिन हरीश की सेवा में कभी कोई कमी नहीं आने दी।

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मजबूरी में लिया गया सबसे कठिन फैसला

जब एक दशक से ज्यादा समय बीत गया और डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि हरीश के मस्तिष्क में सुधार की कोई संभावना नहीं है, तब परिवार के सामने एक ऐसा धर्मसंकट खड़ा हुआ जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। अपने ही जिगर के टुकड़े के लिए मौत मांगना दुनिया का सबसे कठिन फैसला था। सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मिलने के बाद AIIMS के डॉक्टरों ने चरणबद्ध तरीके से उनकी जीवन रक्षक प्रणाली (Life Support) को हटाना शुरू किया।

वो 10 दिन: जिंदगी और मौत के बीच का संवाद

इस कहानी का सबसे भावुक हिस्सा वे आखिरी 10 दिन रहे। लाइफ सपोर्ट हटने के बाद भी हरीश की सांसें चलती रहीं। मानो उनका शरीर जाने से पहले जिंदगी के साथ एक आखिरी संवाद कर रहा हो। बिना मशीनी मदद के 10 दिनों तक चलती उन सांसों ने परिवार की हर पल परीक्षा ली। हर गुजरता दिन एक तरफ विदाई का दुख दे रहा था तो दूसरी तरफ कुदरत की उस जिजीविषा को दिखा रहा था जिसने मशीनों को भी मात दे दी थी। माता-पिता के लिए ये पल उम्मीद और पीड़ा के बीच झूलते रहने वाले थे।

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हरीश की इस विदाई ने समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • क्या 'इच्छामृत्यु' को केवल एक कानूनी प्रक्रिया माना जाए या एक लाचार परिवार की आखिरी मजबूरी ?
  • क्या हमारा स्वास्थ्य ढांचा ऐसे परिवारों की लंबी लड़ाई में साथ देने के लिए पर्याप्त है ?

हरीश राणा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका 13 साल का मौन संघर्ष और उनके माता-पिता का असीम धैर्य हमेशा याद किया जाएगा। एक जिंदगी जो सालों तक खामोश रही, उसने जाते-जाते पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

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