लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश परंपराओं की धरती है। सालों से निभाई जा रही परंपराओं की वजह से ही हिमाचल का अस्तित्व है। इसी कड़ी में आती है लाहौल-स्पीति की एक अनोखी शादी जिसे कूजी विवाह कहा जाता है।

परिवार के विरोध के खिलाफ छोटी शादी

कूजी विवाह का अर्थ है- छोटी शादी। धर्म और जाति एक होने पर भी बहुत सारे युवक-युवतियां प्रेम के चलते परिजनों के विरोध के बावजूद छोटी शादी यानी कूजी विवाह कर लेते हैं। फिर लड़की के परिजन लड़के वालों से हजारों रुपये व सोने के आभूषण को इज्जत व जुर्माने के तौर पर रखने के बाद बड़ी शादी करने के लिए कहते हैं।

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मां-बाप की शादी में शरीक होते हैं बच्चे

बड़ी शादी होने पर ये पैसा व जेवर लड़की व लड़के के संयुक्त खाते में जमा किए जाते हैं। कूजी विवाह के कई सालों बाद दोनों पक्षों के परिजनों के मानने पर होने वाली बड़ी शादी में बच्चे भी मां-बाप के हाथ पीले होते देखते हैं और उनके सात फेरों में शरीक होते हैं। यही वजह है कि लाहौल घाटी में बच्चे अपने मां-बाप की शादी में बाराती बन कर शामिल होते हैं।

सामाजिक मान्यता के लिए बड़ी शादी

लाहौल घाटी में इस तरह सैकडों लोगों ने कूजी विवाह के कई साल बाद बड़ी शादी का सेहरा बांधा है। प्रेम संबंधों या सामाजिक व्यवस्था के कारण कई जोड़ों ने पहले कूजी विवाह कर एक साथ रहने के बाद सामाजिक मान्यता हासिल करने के लिए बड़ी शादी रचाई है। इसके लिए बाकायदा शुभ मुहूर्त निकाल कर सात फेरे लिए जाते हैं।

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लाहौल में सदियों से नहीं है दहेज प्रथा

प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र लाहौल में सदियों से दहेज प्रथा नहीं है। यहां पर लड़की वालों से किसी भी प्रकार का दहेज व अन्य कीमती सामान नहीं मांगा जाता जो ‌कि एक मिसाल है। यही नहीं कूजी शादियों में भी हर्जाना लड़के के पक्ष को चुकाना पड़ता है। ये हर्जाना लड़की भगाने पर प्रतिष्ठा को होने वाले नुकसान के बदले में देना पड़ता है।