शिमला। हिमाचल प्रदेश में हमीरपुर के सरकारी स्कूलों में बच्चों को जादू दिखाकर पैसे बटोरने के आदेश पर जग हंसाई होने के बाद शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने इस पर रोक लगा दी है। जिले के डिप्टी डायरेक्टर एलिमेंटरी एजुकेशन ने शिक्षा मंत्री ने खुद फोन कर सफाई मांगी। शिक्षा मंत्री का कहना है कि जिस तरह से ऑर्डर जारी किए गए, वह गलत है।
शिक्षा मंत्री का बयान
रोहित ठाकुर ने कहा कि जादू दिखाना गलत नहीं है। लेकिन ऐसे बेतुके आदेश देना ठीक नहीं है। डिप्टी डायरेक्टर पर सरकार ने कड़ा संज्ञान लिया है। आपको बता दें कि 11 मार्च डिप्टी डायरेक्टर एलिमेंटरी एजुकेशन हमीरपुर ने एक आदेश जारी किए। इसमें एक जादूगर को सरकारी स्कूलों में जादू दिखाने के लिए अधिकृत किया गया। इस चिट्ठी में कहा गया कि मैजिक शो से होने वाली इनकम का 30 प्रतिशत पैसा मुख्यमंत्री राहत कोष आपदा प्रबंधन ने जमा किया जाएगा।
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तेजी से वायरल हुआ पत्र
हमीरपुर जिले में प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक का पत्र सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और लोगों ने इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देना शुरू कर दिया।
कमाई का हिस्सा सरकार को
शिक्षा विभाग की मंजूरी के बाद मंडी जिले के बरोट क्षेत्र के जादूगर बलवीर सिंह हमीरपुर जिले के विभिन्न सरकारी स्कूलों में जादू शो करने की अनुमति दी गई थी। इन कार्यक्रमों के दौरान उन्हें बच्चों को जादू की कला के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों जैसे अंधविश्वास, जमाखोरी और बालिका शिक्षा के महत्व को लेकर जागरूक करना था।
क्या कहते हैं शिक्षा विभाग के अधिकारी?
इस मामले को लेकर जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कमल किशोर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जादूगर बलवीर सिंह ने परोपकारी कार्य करने की इच्छा जताई थी, जिसके तहत उन्हें सरकारी स्कूलों में जादू शो करने की अनुमति दी गई। उन्होंने कहा कि आदेश के पीछे उद्देश्य यह है कि शो के माध्यम से बच्चों में सामाजिक जागरूकता भी फैलाई जाए।
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स्कूली बच्चों से धन जुटाने पर उठ रहे सवाल
हिमाचल प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान कर रही है। किताबें, यूनिफॉर्म, बैग, मिड-डे मील सहित अन्य सुविधाओं पर सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है। बच्चों से किसी भी प्रकार की फीस नहीं ली जाती। ऐसे में अब उन्हीं बच्चों के माध्यम से धन एकत्र करना और उसे सरकारी खजाने में जमा करवाने का यह निर्णय कई सवाल खड़े कर रहा है।
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सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना
सोशल मीडिया पर इस फैसले की तीखी आलोचना हो रही है। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि शिक्षा विभाग को राहत कोष के लिए फंड इकट्ठा करना ही था तो इसके लिए और भी विकल्प मौजूद थे। बच्चों की शिक्षा पर पहले ही सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, ऐसे में इस तरह से बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से राजस्व स्रोत बनाना तर्कसंगत नहीं लगता।
