शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करते समय विभाग को अपने आदेश में ठोस कारण दर्ज करने होंगे।
HRTC पर भड़का हाईकोर्ट
अदालत ने कहा कि सिर्फ सजा सुना देना पर्याप्त नहीं है। यह भी बताना आवश्यक है कि संबंधित कर्मचारी को किस आधार पर दोषी माना गया और दंड देने के पीछे क्या तर्क हैं। अगर आदेश में कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है तो ऐसा आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
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अदालत ने सुनाया फैसला
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कारण और तर्क किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक आदेश की आत्मा होते हैं। अगर किसी कर्मचारी को यह तक न बताया जाए कि उसके खिलाफ कार्रवाई किन तथ्यों और आधारों पर की गई है, तो वह अपने बचाव का प्रभावी अधिकार भी नहीं निभा सकता।
HRTC से जुड़ा था मामला
यह मामला HRTC के वरिष्ठ स्टोरकीपर खेम सिंह से संबंधित है। वर्ष 2019 में कुल्लू डिपो में तैनाती के दौरान उनके खिलाफ डीजल की खपत में कथित अनियमितता, फर्जी बिल तैयार करने सहित कुल आठ आरोप लगाए गए थे।
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विभाग ने किया डिमोट
विभाग ने मामले की जांच करवाई और जांच पूरी होने के बाद 5 मई 2021 को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें वरिष्ठ स्टोरकीपर के पद से हटाकर पेट्रोल पंप अटेंडेंट बना दिया। इसके साथ ही उनके वेतन से 2.57 लाख रुपये की रिकवरी करने का आदेश भी जारी कर दिया गया। खेम सिंह ने इस कार्रवाई को पहले विभाग के समक्ष चुनौती दी। मगर वहां से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने न्याय के लिए हिमाचल हाईकोर्ट का रुख किया।
आदेश में नहीं थे आरोपों पर स्पष्ट निष्कर्ष
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विभागीय रिकॉर्ड और दंडात्मक आदेश का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि कर्मचारी पर लगाए गए आठों आरोपों पर अलग-अलग कोई स्पष्ट चर्चा नहीं की गई थी। इतना ही नहीं, जांच रिपोर्ट के खिलाफ कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों और स्पष्टीकरण पर भी विभाग ने अपने आदेश में कोई विचार दर्ज नहीं किया।
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क्या बोला कोर्ट?
कोर्ट ने कहा कि आदेश में केवल सजा का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जब किसी आदेश का सीधा प्रभाव कर्मचारी के पद, वेतन, सेवा और भविष्य पर पड़ता है- तब विभाग का यह दायित्व बनता है कि वह सभी तथ्यों और तर्कों के आधार पर स्पीकिंग ऑर्डर जारी करे।
स्पीकिंग ऑर्डर क्यों है जरूरी?
अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए कारणयुक्त आदेश देना अनिवार्य है। इससे कर्मचारी को यह समझने का अवसर मिलता है कि उसके खिलाफ कार्रवाई किन आधारों पर की गई है और यदि वह आदेश को चुनौती देना चाहे तो प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रख सके।
कोर्ट के अनुसार, बिना कारण दर्ज किए जारी किया गया आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना जाएगा।
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HC ने रद्द किए विभागीय आदेश
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने HRTC द्वारा जारी वह आदेश रद्द कर दिया। जिसके तहत खेम सिंह को डिमोट किया गया था और उनके वेतन से 2.57 लाख रुपये की रिकवरी के निर्देश दिए गए थे।
बिना कारण बताए नहीं कोई सजा
अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई केवल आरोपों के आधार पर नहीं की जा सकती। विभाग को प्रत्येक आरोप पर स्पष्ट निष्कर्ष, उचित कारण और कानूनी तर्क दर्ज करने होंगे। ऐसा नहीं होने पर संबंधित आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगा।
