#विविध
September 18, 2026
हिमाचल के लिए खतरे की घंटी! तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर, बढ़ेगा पानी और आपदाओं का दौर
75 फीसदी भूस्खलन संभावित क्षेत्र का संबंध हिमालय से
शेयर करें:

शिमला। हिमाचल के पहाड़ों में आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ भारी बारिश, भूस्खलन या बादल फटना नहीं होगी। पहाड़ों की सबसे जरूरी जीवनरेखा यानी पानी भी संकट में पड़ सकती है। हिमालयी ग्लेशियर तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं, हजारों प्राकृतिक झरने या तो सूख चुके हैं या अब पूरे साल पानी नहीं दे रहे।
दूसरी तरफ सड़कों, भवनों, पर्यटन और दूसरे निर्माण कार्यों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों और पर्वतीय विशेषज्ञों की नई रिपोर्ट ने चेताया है कि अगर मौजूदा परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो हिमालय में पानी की उपलब्धता और प्राकृतिक आपदाओं का संकट आने वाले दशकों में और गंभीर हो सकता है।
सिस्टमिक और इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव की ओर से 9 सितंबर को जारी Prosperous and Resilient Himalayas रिपोर्ट में हिमालय के बदलते पर्यावरण को लेकर कई अहम आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट को जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान का तकनीकी सहयोग मिला है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में ग्लेशियरों के द्रव्यमान में कमी की रफ्तार करीब 65 फीसदी तेज हुई है। हिमालय के कई हिस्से वैश्विक औसत से दो से तीन गुना तेजी से गर्म होने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है।
इसका सीधा असर हिमालय से निकलने वाली नदियों पर पड़ सकता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से फिलहाल कुछ समय तक नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन जब बर्फ का भंडार लगातार कम होता जाएगा तो यही नदी प्रवाह घटने लगेगा। रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश हिमालयी नदी घाटियां 2050 के आसपास पीक वाटर की स्थिति में पहुंच सकती हैं।
अगर ग्लेशियरों के पिघलने की मौजूदा गति में बड़ा बदलाव नहीं आया तो 2100 तक हिंदूकुश हिमालय अपने वर्तमान ग्लेशियर आयतन का 80 फीसदी तक खो सकता है। इसका असर सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की पानी की जरूरत पूरी करती हैं।
भारत के हिमालयी हिस्से में पानी का एक और बड़ा स्रोत प्राकृतिक झरने हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय हिमालय में मौजूद 30 लाख से अधिक झरनों में करीब आधे या तो सूख चुके हैं या मौसमी बन गए हैं।
हिमालय के सामने चुनौती सिर्फ पानी की नहीं है। भूस्खलन का खतरा भी लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के चिह्नित भूस्खलन संभावित क्षेत्र का लगभग 75 फीसदी हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में आता है।
इसके बावजूद संवेदनशील इलाकों में निर्माण और विकास गतिविधियां जारी हैं। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले उस क्षेत्र के आपदा जोखिम का वैज्ञानिक आकलन जरूरी होना चाहिए। इसके लिए जोखिम आधारित भू-उपयोग योजना, संवेदनशील क्षेत्रों में नो-बिल्ड जोन और सुरक्षित स्थानों पर निर्माण को प्राथमिकता देने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट ने पहाड़ी क्षेत्रों में विकास की आर्थिक चुनौती को भी सामने रखा है। इसके अनुसार पहाड़ों में बुनियादी सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना मैदानी क्षेत्रों की तुलना में करीब ढाई गुना महंगा पड़ सकता है।
वहीं, हिमालय से मिलने वाले प्राकृतिक संसाधनों से पैदा होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुंचता। दूसरी तरफ पानी की कमी, कचरा, ट्रैफिक, भीड़ और आपदाओं का दबाव इन्हीं पर्वतीय क्षेत्रों को झेलना पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2020 के बीच हिमालयी क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र लगभग 75 फीसदी बढ़ा। यह बढ़ोतरी आबादी की वृद्धि की रफ्तार से करीब 1.7 गुना अधिक रही।
हिमालय में अनुमानित 40 हजार ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इनमें से केवल करीब 0.1 फीसदी की ही निगरानी हो रही है। यानी इतने बड़े पर्वतीय क्षेत्र में ग्लेशियरों की स्थिति और उनसे जुड़े संभावित खतरों पर नियमित वैज्ञानिक निगरानी अभी बेहद सीमित है।
पर्यटन का दबाव भी इस पूरी तस्वीर का अहम हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय हिमालय में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं। कई पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर पर्यटकों की संख्या स्थानीय बुनियादी ढांचे और पर्यावरण की क्षमता पर दबाव डाल रही है।
रिपोर्ट में हिमालयी क्षेत्र को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए 10 प्रमुख क्षेत्रों में बदलाव की जरूरत बताई गई है। इनमें प्राकृतिक झरनों को दोबारा जीवित करना, जंगलों का संरक्षण, ब्लैक कार्बन कम करना, ग्लेशियर जोखिम प्रबंधन, आपदा की पूर्व चेतावनी व्यवस्था, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और पहाड़ी परिस्थितियों के मुताबिक निर्माण शामिल हैं।
इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन और अनियोजित निर्माण का दबाव कम करने, जोखिम आधारित भू-उपयोग योजना लागू करने और पहाड़ काटने में भारी विस्फोटकों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की जरूरत बताई गई है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी भट्ट के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने की गति को लंबे समय में कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी जरूरी है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है।