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September 17, 2026
हिमाचल HC ने सुलझाया 40 साल पुराना मामला : पिता की जमीन पर शादीशुदा बेटी को दिया हक
SDM ने रद्द कर दी थी महिला की अर्जी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शादीशुदा बेटियों के हक को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को उसके माता-पिता की जमीन का कानूनी वारिस बनने से वंचित नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि अगर बेटी माता-पिता की कानूनी वारिस है- तो वह जमीन का पट्टा (कागज) अपने नाम करवाने का अधिकार रखती है। न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने इस मामले में SDM शिमला के उस आदेश को रद्द कर दिया- जिसमें विवाहित होने के आधार पर याचिकाकर्ता का दावा खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के नाम जमीन का पट्टा दो महीने के भीतर जारी किया जाए।
मामला शिमला जिले की चौपाल तहसील के नवनी गांव की निवासी शांति से संबंधित है। याचिका के अनुसार वर्ष 1972 में सरकार ने शांति के पिता मीना राम को नौतोड़ योजना के तहत 3 बीघा 2 बिस्वा जमीन मंजूर की थी। जमीन का कब्जा उन्हें दे दिया गया था और इसके बाद वह उस भूमि पर खेती भी करते रहे।
हालांकि, राजस्व विभाग के स्तर पर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी नहीं हो सकीं और जमीन का सरकारी पट्टा निर्धारित प्रक्रिया के तहत हस्ताक्षरित नहीं हो पाया। मीना राम के निधन के बाद उनकी पत्नी ने जमीन का पट्टा जारी करने के लिए प्रशासन के समक्ष आवेदन किया। पट्टा तैयार भी किया गया, लेकिन उस पर अधिकारियों के हस्ताक्षर नहीं हो सके और मामला आगे नहीं बढ़ पाया।
वर्ष 2012 में शांति की मां का भी निधन हो गया। इसके बाद परिवार में इस जमीन की अकेली वारिस शांति ही रह गईं। याचिका में कहा गया कि वह लंबे समय से संबंधित भूमि पर खेती करती आ रही थीं। वर्ष 2023 में उन्होंने प्रशासन के समक्ष आवेदन देकर जमीन का पट्टा अपने नाम जारी करने की मांग की।
मगर 1 जनवरी, 2024 को SDM शिमला ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। प्रशासन की ओर से वर्ष 1980 में जारी एक सरकारी निर्देश का हवाला देते हुए कहा गया कि विवाहित बेटियों को नौतोड़ जमीन का पट्टा नहीं दिया जा सकता।
SDM के फैसले के खिलाफ शांति ने हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने नौतोड़ भूमि से जुड़े नियमों और वर्ष 1980 के सरकारी पत्र की पड़ताल की। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1980 का पत्र मूल रूप से प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए जारी किया गया था।
हिमाचल प्रदेश नौतोड़ लैंड रूल्स, 1968 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है- जिसके तहत विवाहित बेटी को उसके माता-पिता की कानूनी वारिस होने के बावजूद नौतोड़ जमीन के पट्टे से बाहर किया जा सके।
अदालत ने इसी आधार पर SDM शिमला के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के नाम संबंधित जमीन का पट्टा दो महीने के भीतर जारी किया जाए। इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि केवल विवाह के आधार पर किसी महिला के उत्तराधिकार के दावे को नौतोड़ भूमि के मामले में खारिज नहीं किया जा सकता।
नौतोड़ हिमाचल प्रदेश में जमीन से जुड़ा एक विशेष प्रावधान है। सामान्य तौर पर इसका मतलब ऐसी सरकारी/वन भूमि को नियमों के तहत पात्र व्यक्ति को खेती या घर आदि के उपयोग के लिए पट्टे या अधिकार के रूप में देना होता है। यानी यह जमीन मूल रूप से व्यक्ति की निजी मिल्कियत नहीं होती। सरकार के नियमों के अनुसार पात्र लोगों को इस पर कब्जा/पट्टा या भूमि अधिकार मिल सकता है।