#विविध
September 19, 2026
हिमाचल में अब मनमर्जी से पैसा नहीं खर्च सकेंगी पंचायतें, मोदी सरकार ने लागू की शर्तें
हिमाचल को पांच साल में 3744 करोड़ रुपये का अनुदान
शेयर करें:

शिमला। हिमाचल प्रदेश की ग्राम पंचायतों को 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाली अनुदान राशि के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार ने दायरा तय कर दिया है। अब पंचायतें इस धनराशि को अपनी इच्छानुसार किसी भी विकास कार्य पर खर्च नहीं कर सकेंगी। वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान का उपयोग केंद्र द्वारा निर्धारित 29 विषयों और कार्यों के दायरे में ही करना होगा।
दरअसल, इस व्यवस्था के तहत पंचायतों को विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करने की गुंजाइश रहेगी, लेकिन अनुदान का खर्च संविधान के अनुच्छेद 243जी और 11वीं अनुसूची में पंचायतों से जुड़े निर्धारित विषयों तक सीमित रहेगा। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार हिमाचल प्रदेश को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक कुल 3744 करोड़ रुपये का अनुदान मिलने की अनुशंसा की गई है।
इसमें 2996 करोड़ रुपये बेसिक ग्रांट के रूप में शामिल हैं। बेसिक ग्रांट को दो हिस्सों में बांटा गया है। इसमें 1498 करोड़ रुपये टाइड ग्रांट और इतने ही यानी 1498 करोड़ रुपये अनटाइड ग्रांट के रूप में प्रस्तावित हैं। टाइड और अनटाइड राशि के इस्तेमाल के नियम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन पंचायतों को प्राप्त वित्त आयोग की राशि पंचायतों से संबंधित निर्धारित कार्यक्षेत्र में ही खर्च करनी होगी।
वित्त आयोग की राशि के इस्तेमाल का आधार संविधान के अनुच्छेद 243जी के तहत 11वीं अनुसूची में शामिल पंचायतों से संबंधित विषयों को बनाया गया है। इन विषयों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं।
इनमें कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, जल प्रबंधन, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे कार्य प्रमुख हैं। इसके अलावा सामाजिक वानिकी, लघु एवं कुटीर उद्योग तथा ग्रामीण आवास से जुड़े कार्य भी इस दायरे में आते हैं। पेयजल, ग्रामीण सड़कें, ग्रामीण विद्युतीकरण और गैर-पारंपरिक ऊर्जा से जुड़े काम भी पंचायतों के निर्धारित कार्यक्षेत्र में शामिल हैं।
निर्धारित कार्यों की सूची में केवल बुनियादी ढांचे से जुड़े काम ही नहीं हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समेत कमजोर वर्गों के कल्याण से जुड़े कार्यों को भी इसमें स्थान दिया गया है। इसके अलावा सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पंचायतों द्वारा निर्मित सामुदायिक परिसंपत्तियों के रखरखाव जैसे कार्य भी निर्धारित दायरे में शामिल हैं। इसका मतलब यह है कि वित्त आयोग से मिलने वाले अनुदान का इस्तेमाल पंचायत स्तर पर जरूरत के अनुसार किया जा सकता है, लेकिन जिस काम पर पैसा लगाया जा रहा है, वह निर्धारित 29 विषयों के दायरे में होना जरूरी होगा।
नई व्यवस्था का सीधा असर पंचायतों के वित्तीय फैसलों पर पड़ेगा। पंचायतें स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकास कार्यों को प्राथमिकता दे सकती हैं, लेकिन वित्त आयोग से प्राप्त राशि को ऐसे किसी काम में नहीं लगाया जा सकेगा, जो निर्धारित पंचायत कार्यक्षेत्र से बाहर हो। उदाहरण के तौर पर यदि किसी पंचायत के सामने पेयजल, ग्रामीण सड़क, सिंचाई या सामुदायिक परिसंपत्ति के रखरखाव की जरूरत है तो उपलब्ध राशि का इस्तेमाल संबंधित नियमों के तहत इन कार्यों में किया जा सकता है। लेकिन अनुदान को किसी असंबंधित मद में खर्च करने की स्वतंत्रता पंचायतों के पास नहीं होगी।
वित्त आयोग की राशि के लिए कार्यक्षेत्र निर्धारित करने का उद्देश्य अनुदान को पंचायत स्तर पर तय विकास प्राथमिकताओं से जोड़ना है। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि केंद्र से मिलने वाला पैसा ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सेवाओं और स्थानीय विकास से जुड़े कार्यों पर ही खर्च हो।
जिला पंचायत अधिकारी राणा के अनुसार, 16वें वित्त आयोग के तहत ग्राम पंचायतों द्वारा किए जाने वाले कार्यों का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 243जी की 11वीं अनुसूची में किया गया है। इसी सूची में शामिल 29 कार्यों के तहत वित्त आयोग की राशि का इस्तेमाल किया जाएगा।