शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्तियों और इससे जुड़े रिकॉर्ड को लेकर चल रहे विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले में राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को इस मामले में अब पूरी और तथ्यात्मक जानकारी के साथ अपना पक्ष रखना होगा। यदि अगली सुनवाई तक आवश्यक शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया तो राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।

छह याचिकाओं से जुड़ा है पूरा मामला

मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य को इस मामले में एक निजी पक्षकार की तरह समय नहीं टालना चाहिए। अदालत ने सरकार को आवश्यक विवरण के साथ शपथपत्र दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। हाईकोर्ट में चल रहा यह विवाद करीब छह अलग-अलग याचिकाओं से संबंधित है।

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इन याचिकाओं में पिछले तीन वर्षों के दौरान विभिन्न सरकारी विभागों में की गई आउटसोर्स नियुक्तियों और उससे जुड़े पदों का पूरा ब्योरा मांगा गया था। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से एक सूची अदालत के सामने रखी गई, लेकिन खंडपीठ ने रिकॉर्ड में कई विसंगतियां और विरोधाभास पाए। अदालत के सामने प्रस्तुत आंकड़ों में कई जगह स्वीकृत पदों और रिक्त पदों की संख्या शून्य बताई गई थी। इस पर कोर्ट ने सरकार से अधिक स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी प्रस्तुत करने को कहा।

सरकारी आंकड़ों पर भी उठे सवाल

मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से सरकारी रिकॉर्ड के आंकड़ों पर गंभीर सवाल उठाए गए। उनका कहना है कि केवल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में ही स्वीकृत पदों की संख्या करीब 24,188 है। इसके बावजूद सरकार की ओर से पेश की गई सूची में प्रदेश के सभी 46 विभागों को मिलाकर कुल स्वीकृत पदों की संख्या 30,805 दर्शाई गई।

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याचिकाकर्ताओं ने इन आंकड़ों को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा कि रिकॉर्ड में दिखाई जा रही संख्या वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती। इसी विरोधाभास के चलते हाईकोर्ट ने सरकार से विस्तृत और सत्यापित जानकारी उपलब्ध करवाने को कहा है, ताकि आउटसोर्सिंग व्यवस्था से जुड़े मामलों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। इस मामले में राज्य सरकार पहले हाईकोर्ट के 18 मई और 16 जून 2026 के अंतरिम आदेशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। सरकार ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल की थीं।

तय समय में भी पूरा विवरण नहीं दे सकी सरकार

मामले में 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पांच कार्य दिवसों के भीतर हाईकोर्ट के समक्ष पूर्ण शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए थे। इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग की 6 नवंबर 2025 की अधिसूचना के तहत चयन और नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति भी दी गई थी। हालांकि, ऐसी नियुक्तियां हाईकोर्ट में लंबित मूल रिट याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।

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हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात को गंभीरता से लिया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्पष्ट समयसीमा दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार निर्धारित पांच कार्य दिवसों में पूरा विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाई। खंडपीठ ने सरकार को अब अंतिम अवसर देते हुए कहा है कि अगली सुनवाई तक सभी आवश्यक तथ्यों और दस्तावेजों के साथ शपथपत्र दाखिल किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आदेश की अनुपालना नहीं होने की स्थिति में 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।

जुर्माने की राशि IGMC के मरीज कल्याण फंड में जाएगी

हाईकोर्ट ने संभावित जुर्माने के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। यदि सरकार निर्धारित समय में आवश्यक शपथपत्र दाखिल करने में विफल रहती है और अदालत जुर्माना लगाती है, तो 50 हजार रुपये की राशि IGMC शिमला के Poor Patients Fund में जमा करनी होगी। इससे साफ है कि अदालत आउटसोर्सिंग से जुड़े मामलों में सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई को लेकर गंभीर है। मामले को हाईकोर्ट ने अब 13 अगस्त 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

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अब निगाहें इस बात पर हैं कि राज्य सरकार अगली तारीख से पहले अदालत के निर्देश के अनुसार पूरा शपथपत्र और आउटसोर्स नियुक्तियों से संबंधित विस्तृत रिकॉर्ड पेश करती है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट की सख्ती ने प्रदेश में आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अगली सुनवाई में सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले आंकड़ों और जवाब से यह स्पष्ट हो सकता है कि विभिन्न विभागों में आउटसोर्स नियुक्तियों की वास्तविक स्थिति क्या है और रिकॉर्ड में सामने आई विसंगतियों का आधार क्या है।

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