शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में एक बार फिर सुक्खू सरकार की जबरदस्त फजीहत हुई है। जिला बिलासपुर के सरस्वती संस्कृत कॉलेज डंगार के कर्मचारियों के अधिग्रहण से जुड़े मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए सुक्खू सरकार को uk flQZ जमकर फटकार लगाई] बल्कि सरकार को कड़ा सबक सिखाते हुए दोबारा भारी जुर्माना ठोक दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार जानबूझकर मामले को लटकाने और अपनी एड़ियां रगड़ने का काम कर रही है।कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि सरकार की कार्यप्रणाली से न्यायपालिका संतुष्ट नहीं है।
कर्मचारियों को अदालतों के चक्कर ना कटवाए सरकार
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मुकदमेबाजी का तीसरा दौर है, जो पूरी तरह अनावश्यक था। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार का दायित्व है कि वह अपने ही बनाए नियमों और जारी अधिसूचनाओं का पालन करे, न कि कर्मचारियों को बार-बार अदालतों के चक्कर कटवाए।
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क्या है पूरा विवाद
पूरा मामला कॉलेज के सरकारी अधिग्रहण (Takeover) से जुड़ा है। राज्य सरकार ने 17 जून 2021 को सरस्वती संस्कृत कॉलेज को अपने नियंत्रण में लिया था। नियमों के मुताबिक, जो कर्मचारी अधिग्रहण की तारीख से एक साल पहले से वहां तैनात थे, वे सरकारी सेवा में शामिल होने के पात्र थे। अदालत ने अपने फैसले में यह भी दो टूक कहा कि अधिग्रहण की तारीख ही पूरे मामले का आधार है। 25 अगस्त 1994 की अधिसूचना के क्लॉज-7 के अनुसार, पात्रता का निर्धारण 17 जून 2021 यानी टेकओवर की तारीख के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इसके बावजूद सरकार ने नियमों की अलग व्याख्या कर मामला उलझाया, जिसे अदालत ने पूरी तरह गलत करार दिया।
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सुक्खू सरकार को दूसरी बार लगा जुर्माना
गौरतलब है कि इससे पहले भी एकल पीठ इस मामले में सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा चुकी थी। अब खंडपीठ ने सरकार की अपील को निराधार मानते हुए एक बार फिर उतनी ही राशि का अतिरिक्त जुर्माना लगा दिया। यानी एक ही मामले में सरकार को दूसरी बार आर्थिक दंड झेलना पड़ा है, जो उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
अदालती समय की बर्बादी कर रही सरकार
खंडपीठ ने अपने फैसले में सरकार को आईना दिखाते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों द्वारा बिना सोचे-समझे कानूनी आदेशों की व्याख्या करना और बार-बार अपील करना अदालती समय की बर्बादी है। कोर्ट ने पाया कि इसी तरह के मामले में (सुनील कुमार बनाम राज्य) 31 मई 2024 को पहले ही फैसला आ चुका था, फिर भी सुक्खू सरकार ने आदेशों की अवहेलना जारी रखी।
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कर्मचारियों को अदालतों के चक्कर कटवाना गलत
अदालत ने कड़े शब्दों में कहा, "सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने ही नियमों और अधिसूचनाओं का पालन करे। अपने ही कर्मचारियों को बार-बार अदालतों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना एक कल्याणकारी राज्य की पहचान नहीं है।" यह टिप्पणी सरकार की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
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कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला सरकार की ओर से जानबूझकर देरी करने और कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद उसे उलझाने का उदाहरण है। इस तरह की कार्यशैली न केवल कर्मचारियों के अधिकारों का हनन करती है, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करती है।
