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June 15, 2026

हिमाचल के कई गांव पर संकट : पिघल रही जमीन के नीचे की बर्फ, 11 गुना बढ़ा झील का आकार

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा खतरा

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himachal Global Warming

किन्नौर। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले किन्नौर में बढ़ते तापमान का असर अब पहाड़ों की जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है। यहां कई इलाकों में जमीन के अंदर हजारों साल से जमी रहने वाली बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट तेजी से पिघल रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से पहाड़ी ढलानों की मजबूती कमजोर हो रही है और आने वाले समय में भूस्खलन, ग्लेशियर झील फटने और अचानक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा खतरा

एक नए शोध में सामने आया है कि किन्नौर जिले में पिछले कई दशकों से तापमान लगातार बढ़ रहा है। साल 1951 से 2024 के बीच जिले के औसत तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तापमान बढ़ने की दर करीब 0.016 से 0.019 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष बताई गई है।

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शोध के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण पहाड़ों के अंदर मौजूद बर्फ की परत कमजोर हो रही है। इससे चट्टानों और मिट्टी की पकड़ कम हो सकती है, जिससे पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ने की आशंका है। 

660 गांवों पर किया गया अध्ययन

किन्नौर में पर्माफ्रॉस्ट से जुड़े खतरे को लेकर आईआईटी भुवनेश्वर के शोधकर्ताओं ने विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन में जिले के करीब 660 गांवों को शामिल किया गया।

रिपोर्ट में पाया गया कि कई गांव ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां जमीन के नीचे अभी भी बर्फ मौजूद है। अगर यह बर्फ तेजी से पिघलती है तो जमीन धंसने, चट्टानें गिरने और अचानक बड़े भूस्खलन जैसी घटनाएं हो सकती हैं।

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ग्लेशियर झील फटने का बढ़ा खतरा

शोध में बताया गया है कि पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से ग्लेशियर झीलों पर भी असर पड़ सकता है। बर्फ पिघलने से चट्टानों के खिसकने या मलबा गिरने की वजह से झीलों में अचानक दबाव बढ़ सकता है, जिससे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जैसी स्थिति बन सकती है। ऐसी स्थिति में झील से निकला तेज पानी कुछ ही मिनटों में नीचे बसे क्षेत्रों और जलविद्युत परियोजनाओं तक पहुंच सकता है।

काशंग झील का आकार 11 गुना बढ़ा

शोध में किन्नौर की सात ऐसी झीलों की पहचान की गई है, जो पर्माफ्रॉस्ट वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। इनमें काशंग झील को सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया गया है। उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से पता चला कि साल 1976 में काशंग झील का क्षेत्रफल करीब 33 हजार वर्गमीटर था।

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लेकिन 2024 तक इसका क्षेत्रफल बढ़कर 3.56 लाख वर्गमीटर से ज्यादा हो गया। यानी पिछले कुछ दशकों में झील का आकार करीब 11 गुना बढ़ चुका है। झील में करीब 86 लाख घनमीटर पानी जमा होने का अनुमान है, जिससे इसके फटने की स्थिति में बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

जलविद्युत परियोजनाओं और सड़कों पर मंडरा रहा खतरा

काशंग झील के नीचे काशंग जलविद्युत परियोजना स्थित है। इसके अलावा किन्नौर में कई सड़कें, पुल और अन्य महत्वपूर्ण निर्माण कार्य भी ऐसे क्षेत्रों में हैं जहां पर्माफ्रॉस्ट मौजूद है।

अगर जमीन के अंदर जमी बर्फ तेजी से पिघलती रही तो इन परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ सकती है। भारत-तिब्बत सीमा की ओर जाने वाली कुछ सड़कें भी ऐसे इलाकों से गुजरती हैं।

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वैज्ञानिकों ने निगरानी बढ़ाने पर दिया जोर

विशेषज्ञों का कहना है कि पर्माफ्रॉस्ट वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही खतरे वाले इलाकों के नक्शे तैयार करने, समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए निर्माण कार्य करने की जरूरत है।

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