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June 15, 2026
कर्ज में डूबे हिमाचल पर मोदी सरकार की नई चोट: इस योजना से बढ़ सकता है 800 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
मंत्री अनिरुद्ध सिंह बोले: हिमाचल में विकास कार्यों पर पड़ेगा असर
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मंडी। पहले से ही भारी.भरकम कर्ज और गंभीर आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हिमाचल प्रदेश पर केंद्र की मोदी सरकार ने एक और बड़ा वित्तीय बोझ डाल दिया है। केंद्र सरकार की अगले महीने जुलाई से शुरू हो रही 'गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण' (वीबी जीरामजी) योजना के कारण अब प्रदेश की वित्तीय स्थिति पूरी तरह चरमराने की कगार पर पहुंच गई है।
प्रदेश सरकार का मानना है कि इस नई योजना के लागू होने के बाद राज्य के खजाने पर करीब 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है। इससे उन विकास परियोजनाओं की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है, जिन्हें सरकार पहले ही सीमित संसाधनों और कर्ज के सहारे आगे बढ़ा रही है। मंडी में पंचायत प्रधान और उप.प्रधानों के भव्य शपथ ग्रहण समारोह के बाद प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने इस संकट पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में हिमाचल प्रदेश इस भारी.भरकम बोझ को वहन करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है।
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पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम और उसका पूरा ढांचा बदल दिया है। नई 'वीबी जीरामजी' योजना के तहत अब फंडिंग का अनुपात 90:10 तय किया गया है। यानी योजना को चलाने के लिए अब हिमाचल प्रदेश सरकार को अपनी खाली जेब से 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी देनी होगी, जो राज्य के सीमित संसाधनों पर बहुत बड़ा प्रहार है।
मंत्री ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि इस बार हिमाचल प्रदेश में कुल 407 लाख मैन डेज (मानव दिवस) हैं, जबकि केंद्र सरकार की ओर से राज्य को महज 250 लाख मैन डेज का ही लक्ष्य मिलता है। ऐसे में यदि प्रदेश अपने वास्तविक 407 लाख मैन डेज के आधार पर काम करता है, तो राज्य के खजाने पर सीधे तौर पर 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ना तय है। उन्होंने कहा कि जुलाई में योजना के विधिवत धरातल पर उतरने के बाद ही इसका वास्तविक और अंतिम स्वरूप साफ हो पाएगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार हिमाचल पहले ही राजस्व घाटे और बढ़ते कर्ज के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में यदि नई योजना के तहत राज्य को अतिरिक्त धनराशि जुटानी पड़ती है तो सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए संसाधनों का प्रबंधन और कठिन हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार योजनाओं को जारी रखना आवश्यक है, लेकिन राज्यों की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखे बिना अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी सौंपना कई पहाड़ी राज्यों के लिए चुनौती बन सकता है।
मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार पंचायती राज संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। चालू वित्तीय वर्ष में पंचायती राज संस्थाओं के लिए 429 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उन्होंने बताया कि आगामी वर्षों में प्रदेश की पंचायतों को विभिन्न मदों में कुल 3760 करोड़ रुपये उपलब्ध करवाए जाएंगे। इनमें मंडी जिला को लगभग 429.69 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे, जबकि चालू वर्ष में 69.1 करोड़ रुपये जारी किए जाएंगे। इस राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा टाइड फंड तथा 50 प्रतिशत हिस्सा अनटाइड फंड के रूप में उपलब्ध रहेगा।
ग्रामीण प्रशासन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार प्रत्येक पंचायत में लगभग एक करोड़ रुपये की लागत से मॉडल पंचायत घर विकसित करने की योजना पर कार्य कर रही है। इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों से अपने-अपने क्षेत्रों में 10 बिस्वा से लेकर तीन बीघा तक उपयुक्त भूमि चिन्हित करने को कहा गया है, ताकि भविष्य की विकास योजनाओं को वहां से संचालित किया जा सके।
अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि पंचायतों के कामकाज को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। अधिकांश प्रशासनिक और विकास संबंधी कार्य ऑनलाइन मोबाइल एप के माध्यम से संचालित किए जाएंगे। इसके साथ ही पंचायत प्रतिनिधियों के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण प्रणाली विकसित की जा रही है, जिससे वे घर बैठे विभिन्न योजनाओं, नियमों और प्रक्रियाओं की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
मंत्री ने बताया कि 27 जून को पंचायतों की पहली बैठक आयोजित होगी। इसी दिन वार्ड सदस्यों को शपथ दिलाई जाएगी और नई पंचायतों का औपचारिक कार्यकाल शुरू हो जाएगा। उन्होंने सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों से राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर कार्य करने और सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का आह्वान किया।
अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि इस बार बड़ी संख्या में शिक्षित और युवा प्रतिनिधि पंचायतों में चुनकर आए हैं। उन्होंने पंचायत प्रतिनिधियों से नशा मुक्त हिमाचल अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि पंचायतें न केवल विकास की इकाई हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव की भी सबसे मजबूत कड़ी हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जल संरक्षण और नशे के खिलाफ जनजागरण में पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहेगी।