शिमला। हिमाचल प्रदेश में अब लोगों को न्याय पाने के लिए सालों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे पहले अकसर कोई भी आपराधिक घटना होने पर पीड़ित पक्ष को इंसाफ के लिए सालों तक इंतजार करना पड़ता था। इस दौरान कोर्ट मंे तारीख पर तारीख पड़ती रहती थी और न्याय के लिए सालों इंतजार करना पड़ता था, लेकिन अब यह तारीख पर तारीख की प्रथा खत्म होने जा रही है।
हर दिन होगी आपराधिक मामले की सुनवाई
दरअसल हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा निर्णय लेते हुए आपराधिक मामलों की डे-टू-डे यानी हर रोज सुनवाई करने की तैयारी शुरू कर दी है। जिसके लिए एक कमेटी का गठन किया जा गया है। अगर हाईकोर्ट का यह निर्णय सिरे चढ़ता है तो आने वाले समय में आपराधिक मामलों में पीड़ित पक्षों को न्याय के लिए सालों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
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हिमाचल हाईकोर्ट ने बनाई कमेटी
बता दंे कि न्यायिक प्रणाली को अधिक प्रभावी और त्वरित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने अधीनस्थ अदालतों में डे-टू-डे (हर दिन) सुनवाई सुनिश्चित करने के तौर-तरीकों पर विचार के लिए दो न्यायाधीशों की एक विशेष समिति गठित की है। यह समिति न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा और न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की अध्यक्षता में कार्य करेगी। समिति का उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालयों में चल रहे आपराधिक मामलों की लंबी अवधि को कम करना और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाना है।
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बना नया ढांचा
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए हालिया आदेश के अनुरूप लिया गया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन बनाम मीर उस्मान मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि प्रत्येक हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश अपने प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग करते हुए राज्य की जिला न्यायपालिका को एक सर्कुलर जारी करें, जिसमें आपराधिक मामलों की सुनवाई लगातार प्रतिदिन करने की व्यवस्था हो। इस दिशा.निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक प्रक्रिया तेज़ और पारदर्शी हो, ताकि कोई भी मामला वर्षों तक अधर में न लटका रहे।
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अब नहीं मिलेगा अनावश्यक स्थगन
निर्देशों के अनुसार जब किसी आपराधिक मामले में गवाहों की जांच शुरू हो जाती है, तो वह प्रक्रिया हर दिन जारी रहेगी, जब तक कि हाजिर सभी गवाहों के बयान दर्ज न हो जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिना किसी विशेष और लिखित कारण के सुनवाई स्थगित नहीं की जाएगी। अब वकीलों की व्यक्तिगत सुविधा या अन्य मामलों में व्यस्तता को स्थगन का कारण नहीं माना जाएगा। केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों जैसे परिवार में किसी की मृत्यु या गंभीर स्वास्थ्य कारण को ही सुनवाई टालने का वैध आधार माना जाएगा।
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अब नहीं चलेगा सालों लंबा इंतज़ार
कई बार देखा गया है कि एक आपराधिक मामला निपटने में 5 से 10 साल तक लग जाते हैं। इससे न केवल पीड़ित पक्ष को मानसिक कष्ट होता है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ता है। हाई कोर्ट की इस पहल से अब यह उम्मीद की जा रही है कि न्याय में देरी, न्याय से इनकार वाली स्थिति खत्म होगी। अब अदालतों में वह दौर नहीं रहेगा जब सुनवाई के दौरान बार.बार कहा जाता था, अगली तारीख दी जाए।
जनता को समय पर मिलेगा न्याय
इस निर्णय से न केवल अदालतों का कामकाज तेज़ होगा, बल्कि लंबित मामलों का बोझ भी कम होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम आम नागरिकों को समय पर न्याय दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक सुधार साबित हो सकता है। इससे अधीनस्थ अदालतों में अनुशासनए जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही, गवाहों की सुरक्षा और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने में भी आसानी होगी।
