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November 4, 2025

CM सुक्खू के फैसले को कोर्ट में चुनौती- कई कांग्रेस नेता भी कर चुके हैं विरोध, जानें मामला

कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसले ने पकड़ा तूल

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MC Mayor Shimla CM Sukhu Himachal High Court

शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर शिमला नगर निगम सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में 25 अक्तूबर को हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए मेयर का कार्यकाल पांच वर्ष तक बढ़ाने के निर्णय ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। इस फैसले को चुनौती देते हुए एडवोकेट अंजलि सोनी वर्मा ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है।

हाईकोर्ट आज करेगा सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ आज इस मामले पर सुनवाई करेगी। याचिका में हिमाचल सरकार के साथ-साथ राज्य चुनाव आयोग, शहरी विकास विभाग, शिमला नगर निगम के आयुक्त, और वर्तमान मेयर सुरेंद्र चौहान को भी पक्षकार बनाया गया है।

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एडवोकेट अंजलि सोनी वर्मा ने याचिका में तर्क दिया है कि कैबिनेट द्वारा मेयर का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला नगर निगम अधिनियम की भावना और चुनावी पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है। उनका कहना है कि यह निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है, क्योंकि इससे तय रोस्टर प्रणाली प्रभावित होती है।

मेयर कार्यकाल बढ़ाने का फैसला

25 अक्तूबर को हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने यह निर्णय लिया कि शिमला नगर निगम के मेयर का कार्यकाल अब 3 वर्ष के बजाय 5 वर्ष किया जाएगा। इसके पीछे सरकार का तर्क था कि इससे विकास कार्यों को निरंतरता मिलेगी और प्रशासनिक स्थिरता बनी रहेगी। लेकिन इस निर्णय ने राजनीतिक हलकों में तूफान खड़ा कर दिया।

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कई कांग्रेस नेता भी कर चुके हैं विरोध

दरअसल, शिमला नगर निगम के मौजूदा रोस्टर के अनुसार, अगली बारी महिला पार्षद के मेयर बनने की थी। तीन वर्षीय कार्यकाल के खत्म होने पर नए मेयर का चुनाव तय कार्यक्रम के अनुसार होना था। लेकिन सरकार के अचानक कार्यकाल बढ़ाने के निर्णय ने इस रोस्टर को स्थगित कर दिया, जिससे न केवल विपक्ष बल्कि कांग्रेस के भीतर भी असंतोष की लहर उठी है।

कांग्रेस के पार्षदों में भी नाराजगी

आश्चर्य की बात यह है कि यह विरोध केवल भाजपा की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के अपने पार्षदों की तरफ से भी देखने को मिला। कई पार्षदों ने खुलकर कहा कि यह निर्णय रोस्टर प्रणाली के साथ छेड़छाड़ है, और इससे पारदर्शी व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं। पार्षदों का कहना है कि पार्टी का यह फैसला “लोकतांत्रिक भावना” के विरुद्ध है और इससे निगम के भीतर असंतुलन पैदा होगा।

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CM सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस असंतोष को शांत करने के लिए सभी कांग्रेस पार्षदों को CM आवास ओक ओवर बुलाकर मीटिंग की, जहां उन्होंने कहा कि सरकार का निर्णय “प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक” था और इसका राजनीतिक उद्देश्य नहीं है। लेकिन इस बैठक के बाद भी असहमति पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

भाजपा ने फैसले को बताया ‘राजनीतिक चाल’

दूसरी ओर, भाजपा पार्षदों ने इस कदम को लोकतंत्र का मज़ाक बताते हुए नगर निगम की हालिया बैठक में जोरदार विरोध किया। भाजपा पार्षदों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार अपने मेयर को बनाए रखने के लिए कानूनी ढांचे में हेरफेर कर रही है।

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उन्होंने कहा कि सरकार यह नहीं चाहती कि रोस्टर के अनुसार महिला पार्षद को मेयर पद का अवसर मिले, इसलिए उसने कार्यकाल बढ़ाने का निर्णय जल्दबाजी में ले लिया। भाजपा का यह भी कहना है कि मेयर का कार्यकाल बढ़ाना राजनीतिक लाभ के लिए की गई एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि सत्ताधारी दल नगर निगम पर नियंत्रण बनाए रख सके।

कानूनी रूप से क्या है स्थिति

कानूनी जानकारों के अनुसार, नगर निगम के मेयर का कार्यकाल हिमाचल प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1994 के तहत तय होता है। इस अधिनियम में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मेयर और डिप्टी मेयर का कार्यकाल तीन वर्ष से अधिक नहीं होगा, जब तक कि राज्य विधानमंडल इस अधिनियम में संशोधन न करे।

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इस स्थिति में सवाल उठता है कि क्या कैबिनेट निर्णय से ही कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है या इसके लिए विधानसभा में विधेयक पारित करना आवश्यक है? हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में यही बिंदु मुख्य रूप से उठाया गया है।

अब नजरें हाईकोर्ट पर

राजनीतिक रूप से यह मामला सत्ताधारी कांग्रेस सरकार के लिए संवेदनशील परीक्षा बन गया है। एक ओर पार्टी के भीतर मतभेद उभर रहे हैं, दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को “लोकतंत्र बनाम सत्ता” के रूप में जनता के बीच ले जा रहा है। अब सारी निगाहें हाईकोर्ट की खंडपीठ पर टिकी हैं, जो आज सुनवाई के दौरान यह तय करेगी कि क्या सरकार का निर्णय वैध था या नहीं।

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