रिकांगपिओ/किन्नौर। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र किन्नौर जिला की शिगारचा ग्राम पंचायत ने लोकतंत्र और सामाजिक एकता की ऐसी मिसाल पेश की है- जिसकी चर्चा अब पूरे क्षेत्र में हो रही है।
निर्विरोध चुने प्रधान-उप प्रधान
पंचायत में आयोजित एक विशेष बैठक के दौरान ग्रामीणों ने आपसी सहमति से आगामी पंचायत चुनावों के लिए सभी प्रतिनिधियों का चयन कर लिया। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ शिगारचा पंचायत जिले की पहली ऐसी पंचायत बन गई है- जहां सभी पदों पर चुनाव निर्विरोध संपन्न हुए।
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पंचायत में चुनावी टकराव खत्म
बैठक का माहौल पूरी तरह सौहार्दपूर्ण रहा, जहां किसी प्रकार का विरोध या मतभेद देखने को नहीं मिला। ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से चंद्र कला को ग्राम पंचायत का प्रधान चुना। इसके साथ ही उप-प्रधान पद के लिए भी बिना किसी प्रतिस्पर्धा के सहमति बनी। पंचायत के पांचों वार्डों में भी एकजुटता की मिसाल देखने को मिली- जहां हर वार्ड से प्रतिनिधियों का चयन शांतिपूर्ण तरीके से किया गया।
पंच पदों के लिए चुने गए प्रतिनिधि
खास बात यह रही कि किसी भी वार्ड में चुनाव की नौबत ही नहीं आई और सभी नामों पर ग्रामीणों ने एकमत सहमति जताई। पंच पदों के लिए चुने गए प्रतिनिधियों में-
- वार्ड नंबर-1 : मंगला देवी
- वार्ड नंबर-2 : वरुण
- वार्ड नंबर-3 : अजय कुमार
- वार्ड नंबर-4 : सीमा देवी
- वार्ड नंबर-5 : रात्र कुमारी
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पंचायत ने लिया बड़ा फैसला
इस बैठक में केवल वर्तमान चुनाव ही नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर भी एक अनोखा और दूरदर्शी निर्णय लिया गया। गांव के लोगों ने मिलकर यह तय किया कि अगले पंचायत चुनाव में प्रधान पद कांग्रेस पार्टी को और उप-प्रधान पद भारतीय जनता पार्टी को दिया जाएगा।
गुटबाजी को किया खत्म
इस सहमति का उद्देश्य गांव में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण पैदा होने वाली गुटबाजी को खत्म करना और विकास कार्यों को प्राथमिकता देना है। ग्रामीणों का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान अक्सर रिश्तों में खटास आ जाती है और गांव का माहौल प्रभावित होता है।
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आपसी सहमति से चुनाव
ऐसे में आपसी सहमति से प्रतिनिधियों का चयन करना न केवल सामाजिक सौहार्द को बनाए रखता है, बल्कि समय और सरकारी संसाधनों की भी बचत करता है। इसी सोच के तहत यह भी तय किया गया कि भविष्य में भी पंचायत चुनाव इसी तरह आपसी सहमति से कराए जाएंगे।
पंचायत ने पेश की मिसाल
शिगारचा पंचायत की यह पहल अब एक मिसाल बनकर उभर रही है। स्थानीय बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक परंपराओं को एक नई दिशा देने वाला है, जहां प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग को महत्व दिया गया है। किन्नौर के इस छोटे से गांव ने यह दिखा दिया है कि अगर इरादा मजबूत हो तो लोकतंत्र को टकराव नहीं, बल्कि सहमति और भाईचारे के साथ भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
