शिमला। हिमाचल प्रदेश भूकंप के खतरे के लिहाज से अब देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हो गया है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी संशोधित राष्ट्रीय भूकंपीय जोनेशन मानचित्र में पूरे हिमाचल प्रदेश को नव स्थापित जोन-6 में रखा गया है।

पूरे हिमाचल पर मंडराया खतरा

इस नए वर्गीकरण के साथ प्रदेश अब भूकंप जोखिम की सबसे उच्च श्रेणी में आ गया है। इससे पहले हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को जोन-4 और जोन-5 में रखा गया था, जहां भूकंप का खतरा तो था, लेकिन उसका स्तर क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग माना जाता था।

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पूरा राज्य जोन VI में

अब नए मानचित्र के अनुसार प्रदेश के सभी जिलों को एक ही श्रेणी यानी जोन-6 में शामिल कर दिया गया है, जिससे पहले मौजूद क्षेत्रीय अंतर समाप्त हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

 

आपदा तैयारी और सुरक्षित निर्माण पर जोर

भूकंपीय श्रेणी में यह बदलाव प्रदेश के लिए एक चेतावनी की तरह माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार अब हिमाचल प्रदेश में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को और मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही भवन निर्माण के दौरान भूकंपरोधी मानकों को सख्ती से लागू करना भी जरूरी हो गया है।

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बड़े भूकंप की स्थिति

विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और ढलानों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए भविष्य की योजना बनाते समय भूकंप के जोखिम को प्रमुखता देनी होगी। इसके लिए आधुनिक तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक सुरक्षित निर्माण प्रणालियों को भी अपनाने की जरूरत है।

भारी नुकसान की आशंका

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण NDMA द्वारा तैयार किए गए भूकंप परिदृश्य के अनुसार यदि हिमाचल प्रदेश में मध्यरात्रि के समय 8.0 तीव्रता का भूकंप आता है, तो इसका प्रभाव बेहद गंभीर हो सकता है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि ऐसे भूकंप से प्रदेश की लगभग 68,56,509 आबादी प्रभावित हो सकती है।

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लोगों की जान को खतरा

संभावित स्थिति में करीब 1,60,000 लोगों की जान जाने और लगभग 11 लाख लोगों के घायल होने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा बड़ी संख्या में भवनों और बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंच सकता है।

नुकसान कम करने के लिए सुझाए गए उपाय

विशेषज्ञों ने भूकंप से होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं। इन उपायों से प्राकृतिक आपदाओं के समय नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इनमें-

  • शहरों और कस्बों में जल निकासी प्रणाली को मजबूत बनाना
  • नालों और जल निकासी मार्गों से अतिक्रमण हटाना
  • असुरक्षित क्षेत्रों में निर्माण कार्यों को रोकना
  • पहाड़ियों और ढलानों की स्थिरता बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाने
  • भूमि उपयोग की बेहतर योजना बनाने की भी जरूरत बताई गई है। 

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पारंपरिक निर्माण तकनीकें भी कारगर

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने पुराने समय में आपदाओं के अनुभव से कई सुरक्षित निर्माण तकनीकें विकसित की थीं। इनमें धज्जी दीवार और काष्ठकूणी शैली से बने पारंपरिक मकान प्रमुख उदाहरण हैं।

विशेषज्ञों ने दिया सुझाव

इन पारंपरिक निर्माण पद्धतियों को भूकंप के झटकों को सहने के लिहाज से काफी सुरक्षित माना जाता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि आधुनिक समय में इन तकनीकों को नए निर्माण मानकों के साथ जोड़ा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर लकड़ी की जगह आरसीसी संरचना का इस्तेमाल करते हुए भी इन शैलियों की मजबूती को बरकरार रखा जा सकता है।

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‘हिम कवच’ एप से मिलेगी जानकारी

सुरक्षित और भूकंपरोधी निर्माण के दिशा-निर्देश आम लोगों तक पहुंचाने के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) ने ‘हिम कवच’ नाम से एक मोबाइल एप विकसित किया है।

कैसे काम करेगी एप?

यह एप खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के मकान मालिकों, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग के अभियंताओं तथा अन्य तकनीकी विशेषज्ञों के लिए उपयोगी है। इसके माध्यम से भवन निर्माण से जुड़े दिशा-निर्देश और तकनीकी जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है। इस एप के जरिए घर बनाने की प्रक्रिया के हर चरण में सुरक्षित और आपदा-रोधी निर्माण पद्धतियों को अपनाने में मदद मिलती है, जिससे भविष्य में भूकंप से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

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मनाया जाएगा आपदा जागरूकता दिवस

हिमाचल प्रदेश में ऐतिहासिक कांगड़ा भूकंप की स्मृति में हर साल 4 अप्रैल को आपदा जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष भी कांगड़ा भूकंप की 121वीं बरसी के अवसर पर राज्य, जिला और समुदाय स्तर पर विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

जागरूकता कार्यक्रम किए जाएंगे आयोजित

इसके अलावा 1 से 5 अप्रैल तक प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में भी आपदा प्रबंधन से जुड़े प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम और अभ्यास आयोजित किए जाएंगे। इन गतिविधियों का उद्देश्य लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति जागरूक बनाना और आपात स्थिति में सही तरीके से प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए आपदा के प्रति जागरूकता और सुरक्षित निर्माण ही भविष्य में बड़े नुकसान को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय हो सकता है।

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