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June 4, 2026

सुक्खू सरकार को हाईकोर्ट का करारा झटका! अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में MLA नहीं डाल सकेंगे वोट

हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार के आदेश पर लगाई रोक

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Himachal High Court

शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को कानूनी मोर्चे पर एक बार फिर बहुत बड़े और करारे झटके का सामना करना पड़ा है। हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार के उस विवादित फैसले और स्पष्टीकरण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है, जिसके तहत स्थानीय विधायकों को नगर परिषद (नप) और नगर पंचायतों (नपं) के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चुनाव में मतदान करने (वोट डालने) का विशेष अधिकार दिया गया था।

 

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ (डबल बेंच) ने इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर एक साथ गहन सुनवाई करने के बाद यह अंतरिम आदेश जारी किया है। कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद अब राज्य की शहरी स्थानीय निकायों के शीर्ष पदों के चुनाव में विधायक अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल पाएंगे।

निर्वाचित पार्षदों ने खटखटाया था अदालत का दरवाजा

दरअसल, यह पूरा मामला सुक्खू सरकार द्वारा जारी किए गए उस स्पष्टीकरण के बाद गरमाया था, जिसमें कहा गया था कि मौजूदा कानून के तहत स्थानीय विधायक भी नगर परिषद और नगर पंचायत के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चयन के लिए होने वाली वोटिंग में हिस्सा ले सकते हैं। सरकार के इस फैसले के खिलाफ विभिन्न नगर निकायों के निर्वाचित पार्षदों ने लामबंद होकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर दी थीं।

 

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याचिकाकर्ताओं (पार्षदों) ने अदालत में मजबूत तर्क देते हुए कहा कि विधायक नगर परिषद या नगर पंचायत की सामान्य बैठकों में पारित होने वाले प्रस्तावों और अन्य विकास कार्यों पर तो अपना वोट दे सकते हैं, लेकिन जब बात संस्था के मुखिया (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष) को चुनने की आती है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकार केवल और केवल जनता द्वारा सीधे चुनकर आए पार्षदों को ही होना चाहिए। पार्षदों का कहना था कि जब नामित (नॉमिनेटेड) सदस्य इन पदों के लिए वोट नहीं कर सकते, तो विधायकों को यह बैकडोर एंट्री क्यों दी जा रही है।

हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश पर लगाई ब्रेक

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने याचिकाकर्ता पार्षदों की दलीलों को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सही और तर्कसंगत पाया। अदालत ने माना कि सरकार का यह स्पष्टीकरण लोकतांत्रिक व्यवस्था और पार्षदों के अधिकारों का हनन करता है।

 

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इसके बाद कोर्ट ने सरकार के आदेश पर रोक लगाते हुए स्थिति साफ कर दी कि जब तक इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक कोई भी विधायक नगर परिषद और नगर पंचायत के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चुनावों में किसी भी प्रकार का मतदान नहीं कर सकेगा।

सुक्खू सरकार को पहले भी मिल चुके हैं कई कानूनी झटके

यह कोई पहला मौका नहीं है जब सुक्खू सरकार के फैसलों को माननीय अदालत की ओर से बदला या रोका गया हो। हालिया दिनों में पंचायत और नगर निकायों से जुड़े सरकार के कई फैसलों को हाईकोर्ट ने पलटा है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर सरकार की किरकिरी हुई है

 

  •  चुनाव टालने पर रोक: इससे पहले सरकार द्वारा स्थानीय चुनाव टालने के फैसले पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए रोक लगा दी थी। 
  • आरक्षण की शक्तियां छीनीं: जिला उपायुक्तों (DC) को दी गई 5 फीसदी सीटों के आरक्षण की विशेष शक्तियों को भी कोर्ट ने असंवैधानिक मानते हुए वापस ले लिया था।
  • अब विधायकों के वोट पर रोक: और अब, विधायकों को वोटिंग राइट देने के फैसले पर रोक लगाकर कोर्ट ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है।

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17 जून को होगी अगली सुनवाई

हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश का सीधा असर राज्य की कई नगर परिषदों और नगर पंचायतों में होने वाले आगामी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनावों पर पड़ना तय माना जा रहा है। कई जगहों पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल जाएंगे। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई 17 जून, 2026 को मुकर्रर की गई है, जहां अदालत इस मुद्दे के कानूनी पहलुओं पर आगे विचार करेगी। तब तक सुक्खू सरकार के इस फैसले पर पूरी तरह से ताला लग चुका है।

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