शिमला। हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नन्हे बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए शुरू की गई प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षक (एनटीटी) भर्ती प्रक्रिया एक बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है। प्रदेश सरकार ने 6,297 पदों को भरने का लक्ष्य रखा था, लेकिन परिणाम उम्मीद से बिल्कुल उलट रहे। दस्तावेजों की छंटनी के बाद स्थिति यह है कि हजारों आवेदकों में से केवल 87 अभ्यर्थी ही पात्रता की कसौटी पर खरे उतरे हैं। इस बड़े अंतर ने सरकार और शिक्षा विभाग के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

10 हजार आवेदनों में 87 अभ्यर्थी ही पात्र

राज्य इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन के माध्यम से शुरू की गई इस भर्ती प्रक्रिया का जिम्मा 14 अलग-अलग कंपनियों को सौंपा गया था। इन 6,297 पदों के लिए लगभग 10,000 युवाओं ने आवेदन किया था। उम्मीद थी कि इससे प्रदेश में बेरोजगारी कम होगी और स्कूलों को शिक्षक मिलेंगे। लेकिन जब चयन की बारी आई, तो एनसीटीई (NCTE) के कड़े नियमों ने अधिकांश उम्मीदवारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। 10 हजार में से महज 87 अभ्यर्थी ही ऐसे मिले जो नियमों के अनुसार पूरी तरह पात्र थे।

 

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एनटीटी भर्ती में कहां फंसा पेंच

इस भर्ती प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा 'डिप्लोमा की अवधि' बनी है। नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर एजुकेशन (NCTE) के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि NTT भर्ती के लिए अभ्यर्थी के पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कम से कम दो वर्ष का डिप्लोमा होना अनिवार्य है। हिमाचल में स्थिति यह है कि अधिकांश अभ्यर्थियों के पास केवल एक साल का डिप्लोमा है। इसके अलावा, कई अभ्यर्थियों ने ऐसे संस्थानों से ट्रेनिंग ली है जिन्हें एनसीटीई से मान्यता ही प्राप्त नहीं है। यही कारण है कि योग्यता की इस दीवार को 99% आवेदक पार नहीं कर सके।

 

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जेबीटी-बीएड को मिलेगा मौका?

संकट गहराते देख प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने विभाग को अन्य विकल्पों पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। अब सरकार इस कानूनी पहलू को खंगाल रही है कि क्या जेबीटी (JBT) और बीएड (B.Ed) डिग्री धारकों को ब्रिज कोर्स या अन्य किसी माध्यम से इन पदों पर नियुक्त किया जा सकता है। सरकार अन्य राज्यों के मॉडल का भी अध्ययन कर रही है ताकि यह देखा जा सके कि वहां इस तरह की रिक्तियों को कैसे भरा गया है। यदि कानूनी विशेषज्ञों की राय सकारात्मक रहती है, तो प्रदेश के हजारों JBT और B.Ed पास युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुल सकते हैं।

 

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खराब आर्थिक स्थिति के बीच वित्तीय बोझ का डर

शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने पड़ोसी राज्य पंजाब का उदाहरण देते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सरकार अपने स्तर पर भर्ती के नियमों में ढील देती है या वेतन का निर्धारण करती है, तो इसका पूरा वित्तीय भार प्रदेश सरकार को उठाना होगा। वर्तमान में हिमाचल की आर्थिक स्थिति केंद्र की मदद के बिना इस भारी-भरकम वेतन बोझ को सहने की स्थिति में नहीं है। इसलिए, सरकार ऐसी राह तलाश रही है जिससे केंद्र से मिलने वाली सहायता भी बनी रहे और पद भी भरे जा सकें।

कैबिनेट के फैसले पर टिकी युवाओं की नजरें

शिक्षा विभाग अब इन तमाम परिस्थितियों, कानूनी पहलुओं और विकल्पों को समेटकर एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर रहा है। इस प्रस्ताव को आगामी कैबिनेट बैठक में चर्चा के लिए रखा जाएगा। कैबिनेट ही तय करेगी कि क्या 87 पात्रों को तुरंत नियुक्ति दी जाए और शेष पदों के लिए भर्ती नियमों में बदलाव कर JBT/B.Ed को मौका दिया जाए या फिर भर्ती का कोई नया मॉडल अपनाया जाए। फिलहाल, हजारों बेरोजगार युवाओं की नजरें सुक्खू सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

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