सोलन। रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला है और ऐसे समय में जब घरों में मिठाइयों और पकवानों की तैयारियां शुरू होने वाली हैं, चीनी के दामों ने चिंता बढ़ा दी है। हिमाचल में चीनी की कीमत कुछ ही समय में करीब 42 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है।

हिमाचल में चीनी महंगी

यानी कुछ महीनों में करीब 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक का उछाल आया है। इसका असर सिर्फ घरों के बजट पर नहीं, बल्कि बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ यानी BBN के फार्मा उद्योग पर भी पड़ने लगा है।

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त्योहार से पहले बढ़े दाम

फार्मा उद्यमियों के मुताबिक चीनी कई दवाओं और आयुर्वेदिक उत्पादों में कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होती है। सिरप से लेकर च्यवनप्राश, प्रोटीन पाउडर, नेचुरल जूस और अन्य उत्पादों के निर्माण में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। ऐसे में कच्चे माल की कीमत में अचानक आई तेजी ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है।

आम आदमी की जेब पर असर

रक्षाबंधन के दौरान मिठाइयों और घर में बनने वाले कई पकवानों में चीनी की खपत बढ़ जाती है। ऐसे में कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है। उद्योग जगत को चिंता है कि यदि कीमतों में तेजी इसी तरह जारी रही तो चीनी आधारित उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है।

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जून में 42 रुपये थी, अब 65 रुपये किलो तक पहुंची

हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के राज्य प्रवक्ता संजय शर्मा के अनुसार जून में चीनी करीब 42 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर लगभग 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। उनका कहना है कि पहले चीनी के दाम में त्योहारों के आसपास एक-दो रुपये प्रति किलो तक का उतार-चढ़ाव सामान्य माना जाता था। मगर इस बार 20 से 25 रुपये तक की बढ़ोतरी चिंता पैदा करने वाली है। फार्मा उद्योग पहले ही प्लास्टिक, एपीआई और एलपीजी जैसी लागतों में बढ़ोतरी का सामना कर रहा है। अब चीनी के दाम बढ़ने से कंपनियों पर अतिरिक्त लागत का दबाव बन गया है।

दवाओं और आयुर्वेदिक उत्पादों की लागत बढ़ने का खतरा

BBN आयुर्वेदिक दवा उत्पादन संघ हिमाचल के अध्यक्ष डॉ. उमा शंकर सिंह ने बताया कि फार्मा और आयुर्वेदिक उद्योग में कई उत्पादों में चीनी का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है। च्यवनप्राश और कई तरह के सिरप इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यदि मौजूदा कीमतों में स्थिरता नहीं आती और कंपनियों के पास मौजूद पुराना स्टॉक खत्म होता है तो उत्पादन लागत और बढ़ सकती है।

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उद्यमियों का कहना है कि दवाओं की कीमतें सामान्य बाजार उत्पादों की तरह तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकतीं। कई दवाओं की कीमतों में बदलाव के लिए अलग प्रक्रिया होती है। ऐसे में कच्चे माल की कीमत बढ़ने के बावजूद कंपनियों के लिए बढ़ी लागत का पूरा भार उपभोक्ताओं पर डालना आसान नहीं है।

एथेनॉल उत्पादन भी माना जा रहा वजह

उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे गन्ने की उपलब्धता, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का बढ़ता इस्तेमाल और बाजार में स्टॉक से जुड़ा दबाव जैसे कई कारण हो सकते हैं। हालांकि कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे वास्तविक कारणों की स्पष्ट तस्वीर बाजार की स्थिति और उपलब्धता से ही सामने आएगी।

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महंगाई के दौर में झटका...

फार्मा उद्यमियों ने सरकार से चीनी की कीमतों में अचानक आई बढ़ोतरी पर ध्यान देने और बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर महंगाई का यह दौर आगे भी जारी रहता है तो इसका असर चीनी से जुड़े उद्योगों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं पर भी दिखाई दे सकता है।

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