#अव्यवस्था
October 30, 2026
सुक्खू सरकार की सुस्ती 285 बच्चों पर पड़ रही भारी, 3 साल से मंदिर में कर रहे पढ़ाई; कब बनेगा नया भवन
दानी ने जमीन दी पैसा दिया, फिर भी सरकार तीन साल में पूरा नहीं कर पाई स्कूल भवन
शेयर करें:

ऊना। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। प्रदेश में कहीं स्कूल एक कमरे में चल रहे हैं तो कहीं विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए अपने स्कूल भवन तक नसीब नहीं हो रहे हैं। ऊना जिले के गगरेट क्षेत्र की राजकीय प्राथमिक पाठशाला बढ़ेड़ा राजपूतां इसका जीता-जागता उदाहरण है।
यहां एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 285 बच्चे पिछले तीन वर्षों से शिव मंदिर परिसर में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि स्कूल के लिए एक समाजसेवी ने अपनी पुश्तैनी जमीन दान कर दी और करीब 50 लाख रुपये खर्च कर नए भवन का निर्माण भी शुरू करवाया, लेकिन इसके बावजूद सरकारी तंत्र की सुस्त रफ्तार के चलते बच्चों को आज तक अपना स्कूल नहीं मिल पाया है। सवाल यह है कि जब जमीन और पैसा दोनों उपलब्ध हैं तो आखिर बच्चों को स्कूल की छत नसीब होने में इतनी देर क्यों हो रही है?
यह भी पढ़ें : हिमाचल में नवंबर माह लाएगा बड़ी सौगात: कर्मचारियों-पेंशनरों को DA - तो व्यापारियों को GST में राहत
गगरेट क्षेत्र के बढ़ेड़ा राजपूतां स्थित इस सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों की परेशानी वर्ष 2023 में शुरू हुई थी। करीब छह दशक पुराने स्कूल भवन को असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए उसे गिरा दिया गया। इसके बाद स्कूल को शिव मंदिर परिसर में शिफ्ट कर दिया गया। उस समय उम्मीद थी कि जल्द ही नए भवन का निर्माण करवाकर विद्यार्थियों को वापस स्कूल में पढ़ने की सुविधा मिल जाएगी, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी यह इंतजार खत्म नहीं हुआ है। आज भी स्कूल की घंटी मंदिर परिसर में बजती है और वहीं बच्चों की कक्षाएं लगती हैं।
यह भी पढ़ें : सुक्खू सरकार की सुप्रीम कोर्ट में हार : अनुबंध कर्मियों के हक में आया फैसला, चुकाने होंगे 8 हजार करोड़
प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने, आधुनिक सुविधाएं देने और बच्चों को बेहतर माहौल उपलब्ध करवाने की बात करती है। मगर बढ़ेड़ा राजपूतां स्कूल की स्थिति व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर रही है। जिस उम्र में बच्चों को बेहतर कक्षाओं, खेल मैदान और शैक्षणिक माहौल की जरूरत होती है, उस उम्र में 285 विद्यार्थियों को मंदिर परिसर में पढ़ाई करनी पड़ रही है। यह केवल एक भवन की कमी का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल है। तीन साल का समय कम नहीं होता, लेकिन इतने लंबे अरसे में भी बच्चों के लिए स्थायी व्यवस्था नहीं हो पाना चिंताजनक है।

यह भी पढ़ें : हिमाचल : करवाचौथ पर हुई अनहोनी- घर लौटते समय खाई में गिरी कार, युवक की दर्दनाक मौ**त
स्कूल की समस्या को देखते हुए स्थानीय समाजसेवी महेंद्र शर्मा ने मिसाल पेश की। उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन शिक्षा विभाग के नाम करवाई और करीब 50 लाख रुपये की लागत से नए स्कूल भवन का निर्माण अपने स्तर पर शुरू करवाया। इतना ही नहीं, स्थानीय विधायक राकेश कालिया ने भी भवन निर्माण के लिए तीन लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी। इसके बावजूद निर्माण कार्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भवन का करीब 70 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब एक व्यक्ति अपनी जमीन और लाखों रुपये बच्चों की शिक्षा के लिए लगा सकता है तो सरकारी व्यवस्था इस भवन को समय पर पूरा करवाने में तेजी क्यों नहीं दिखा पाई?
यह भी पढ़ें : देव विष्णु मतलोड़ा के दर पर हूम का आयोजन, सुबह 4 बजे निभाई गई देव परंपरा- उमड़ा जनसैलाब
इस स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या 285 है। इनमें 83 बच्चे प्री-प्राइमरी और 202 विद्यार्थी प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। स्कूल में करीब आठ किलोमीटर के दायरे से बच्चे पहुंचते हैं। अभिभावक अपने बच्चों को वाहनों के माध्यम से यहां पढ़ने भेजते हैं। इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के लिए मंदिर परिसर में कक्षाएं संचालित करना आसान नहीं है। हालांकि पेयजल, शौचालय और मिड-डे मील की वैकल्पिक व्यवस्था की गई है, लेकिन स्थायी स्कूल भवन में मिलने वाली सुविधाओं और शैक्षणिक माहौल का विकल्प मंदिर परिसर नहीं बन सकता।
बच्चों के लिए भवन की समस्या के साथ ही स्कूल में पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता का मुद्दा भी उठ रहा है। स्कूल की केंद्रीय मुख्य शिक्षिका नीता जसवाल ने विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए अतिरिक्त स्टाफ उपलब्ध करवाने की मांग की है। उनका कहना है कि 285 बच्चों की पढ़ाई और देखरेख की जिम्मेदारी को बेहतर ढंग से निभाने के लिए शिक्षकों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। विशेष रूप से प्री-प्राइमरी कक्षाओं के लिए अलग शिक्षक की आवश्यकता है, ताकि छोटे बच्चों की पढ़ाई और देखभाल प्रभावित न हो।
यह भी पढ़ें : दिवाली से एक दिन पहले हिमाचल सरकार लेगी कई बड़े फैसले, सीएम सुक्खू ने बुला ली कैबिनेट बैठक
स्कूल प्रबंधन समिति के प्रधान विक्रम सिंह ने भी बच्चों की सुविधाओं और शिक्षा को लेकर चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि समाजसेवी महेंद्र शर्मा ने जमीन उपलब्ध करवाने के साथ करीब 50 लाख रुपये खर्च कर भवन निर्माण की पहल की है। अब शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है कि निर्माण कार्य को जल्द पूरा करवाया जाए। उन्होंने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के निर्धारित मानकों के अनुसार अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति और प्री-प्राइमरी कक्षाओं के लिए अलग शिक्षक तैनात करने की मांग की है। उनका कहना है कि बच्चों को लंबे समय तक इस तरह की अस्थायी व्यवस्था में नहीं रखा जाना चाहिए।
वहीं, इस मामले में प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक ऊना सोम लाल धीमान का कहना है कि स्कूल के लिए जमीन शिक्षा विभाग के नाम दर्ज हो चुकी है और अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई है। नए भवन का निर्माण कार्य जारी है। विभाग ने आगामी शैक्षणिक सत्र से नए भवन में कक्षाएं शुरू करवाने का लक्ष्य रखा है।
यह भी पढ़ें : हिमाचल में दर्दनाक हा*दसा : सेना के वाहन से टकराई बेकाबू कार, उड़े परखच्चे - चालक ने तोड़ा दम
फिलहाल विभाग के इस आश्वासन के बीच 285 विद्यार्थियों का इंतजार जारी है। तीन साल से मंदिर परिसर में पढ़ाई कर रहे इन बच्चों को अब तारीखों और आश्वासनों से आगे बढ़कर एक स्थायी स्कूल भवन की जरूरत है। जिस भवन के निर्माण के लिए एक समाजसेवी ने अपनी जमीन और लाखों रुपये तक लगा दिए, उसका काम पूरा करवाना अब विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए। आखिर बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य से जुड़ा यह मामला कब तक सरकारी प्रक्रियाओं में उलझा रहेगा? सुक्खू सरकार के शिक्षा सुधार के दावों की असली परीक्षा भी अब इसी बात से होगी कि इन 285 बच्चों को अपना स्कूल भवन कितनी जल्दी मिल पाता है।