शिमला। हिमाचल प्रदेश की बर्फीली पहाड़ियों में आकार ले रही एक ऐसी महा.परियोजना का मास्टर प्लान तैयार हुआ हैए जिसने सीधे तौर पर सरहद पार पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। हिमाचल में बनने वाले इस नए बांध और रणनीतिक प्रोजेक्ट से पाकिस्तान इस कदर बौखला गया है कि उसके मंत्रियों ने कैमरे के सामने आकर श्हाथ काटनेश् जैसी अमर्यादित धमकियां देना शुरू कर दिया है।

 

सिंधु जल संधि की दुहाई दे रहा पाकिस्तान इस बात से डरा हुआ है कि अगर हिमाचल की वादियों में भारत का यह चक्रव्यूह तैयार हो गया, तो उसकी जल.सुरक्षा हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। दरअसल, हिमाचल की पहाड़ियों में प्रस्तावित यह परियोजना केवल एक बांध या सुरंग निर्माण योजना नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत की भविष्य की जल सुरक्षा और संसाधन प्रबंधन रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। यही कारण है कि अब हिमाचल प्रदेश की नदियां और यहां बनने वाली परियोजनाएं अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई हैं।

 

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पाकिस्तान की लाइफलाइन हिमाचल की चार नदियां

दरअसल पाकिस्तान की प्यास बुझाने वाली सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों में से चार का सीधा वास्ता हिमाचल प्रदेश से है। सतलुज, ब्यास, रावी और चिनाब हिमाचल के पहाड़ों से ही निकलकर आगे बढ़ती हैं। इनमें से चिनाब नदी की उत्पत्ति तो लाहौल की चंद्रा और भागा नदियों के संगम से होती है। यही चिनाब जम्मू.कश्मीर से होते हुए पाकिस्तान पहुंचती है।

कोकसर से शुरू हो रही है बड़ी जल परियोजना

लाहौल-स्पीति के कोकसर क्षेत्र में प्रस्तावित चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना के तहत चंद्रा नदी पर एक बैराज बनाने की योजना है। इसके बाद करीब 8.5 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से नदी के एक हिस्से के पानी को ब्यास नदी बेसिन की ओर मोड़ा जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना का उद्देश्य हिमाचल और उत्तर भारत में उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है, ताकि भविष्य की जल आवश्यकताओं, सिंचाई और ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके।

 

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सिंधु जल संधि के दायरे में है परियोजना

विशेषज्ञों का कहना है कि यह परियोजना भारत के वैधानिक अधिकारों के दायरे में प्रस्तावित की जा रही है। वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत भारत को अपने हिस्से के जल संसाधनों के उपयोग और निर्धारित नियमों के अंतर्गत परियोजनाएं विकसित करने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में यह परियोजना किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के उल्लंघन के बजाय उपलब्ध जल संसाधनों के अधिक प्रभावी उपयोग की दिशा में एक कदम मानी जा रही है।

पाकिस्तान क्यों बौखलाया

दरअसल हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना से चंद्रा नदी के पानी को ब्यास नदी में डाला जाएगा। जिससे पाकिस्तान पहुंचने वाली नदी का पानी काफी कम हो जाएगा। हिमाचल से निकलने वाली नदियों के पानी से ही पाकिस्तान काफी हद तक कृषि और सिंचाई और जलआपूर्ति सुनिश्चित होती है। ऐसे में अगर इन नदियों का पानी कम हो जाएगा तो आने वाले समय में पाकिस्तान पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ेंगे। जिसके चलके अब पाकिस्तान भारत सरकार की इस प्रस्तावित परियोजना से पूरी तरह बौखला गया है।

 

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पानी रोकने पर हाथ काटने की धमकी

पाकिस्तान के मंत्री मुसादिक मलिक ने इस मामले में कैमरे के सामने खुलेआम धमकी दे डाली है। उनका कहना है कि अगर कोई पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने का प्रयास करेगा तो उसके हाथ काट देंगे। हालांकि यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 21 जून को सिंधु जल संधि स्थगित रहने को लेकर भारत को धमकी दी थी। 

जल सुरक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में मिल सकती है मजबूती

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में जल संरक्षण, ऊर्जा उत्पादन और संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हिमाचल प्रदेश जैसे जल समृद्ध राज्य के लिए यह योजना विकास की नई संभावनाएं खोल सकती है। साथ ही उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में जल उपलब्धता और जलविद्युत क्षमता को बढ़ाने में भी इसका योगदान माना जा रहा है।

 

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पर्यावरणीय संतुलन रहेगा सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि परियोजना के साथ पर्यावरणीय चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। लाहौल-स्पीति का हिमालयी क्षेत्र पारिस्थितिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में परियोजना को लागू करते समय पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

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