नई दिल्ली/शिमला। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) परियोजनाओं से हिमाचल प्रदेश को 1966 से लंबित बकाया भुगतान की मांग पूरी होने की उम्मीद अब धरातल पर उतरती दिख रही है। इसे हिमाचल की सुक्खू सरकार की एक और बड़ी जीत माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बीबीएमबी से बकाया एरियर को लेकर एक ऐतिहासिक फैसले की दिशा में कदम बढ़ाते हुए केंद्र सरकार के नए कैशलेस फॉर्मूले पर अपनी मोहर लगाने का संकेत दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में केंद्र की ओर से लाए गए प्रस्ताव ने दशकों पुराने अंतरराज्यीय विवाद का स्थायी समाधान पेश कर दिया है। वहीं, सर्वोच्च अदालत ने पंजाब सरकार के रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए उसे दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्ट रुख बताने का निर्देश दिया है।
60 साल पुराने विवाद के समाधान की ओर बढ़ा मामला
भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की परियोजनाओं से जुड़े इस विवाद की जड़ें वर्ष 1966 तक जाती हैं। हिमाचल प्रदेश लंबे समय से अपने हिस्से की बिजली और उससे जुड़े बकाये की मांग करता रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए नए प्रस्ताव ने इस लंबे विवाद के समाधान की उम्मीद जगा दी है।
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सुक्खू सरकार की रणनीति रंग लाई, हरियाणा राजी, पंजाब को फटकार
सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इस कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई को बेहद मजबूती से लड़ा। हाल ही में मुख्यमंत्री सुक्खू ने बीबीएमबी एरियर को किशाऊ प्रोजेक्ट से जोड़ते हुए हरियाणा के समक्ष जो कड़े मानदंड और शर्तें रखी थीं, उनका बड़ा असर देखने को मिला। हरियाणा सरकार ने केंद्र के इस प्रस्ताव पर सिद्धांतत: अपनी सहमति दे दी है।
हालांकि, पंजाब सरकार के विरोध पर शीर्ष अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया।
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चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पंजाब को फटकार लगाते हुए स्पष्ट कहा कि हिमाचल के पक्ष में डिक्री पारित हुए 15 साल बीत चुके हैं, लेकिन पंजाब को अदालत के फैसलों का पालन न करने की आदत हो चुकी है। पीठ ने चेतावनी दी कि यदि पंजाब दो हफ्तों के भीतर इस सौहार्दपूर्ण प्रस्ताव पर सहमत नहीं होता है, तो कोर्ट खुद मेरिट के आधार पर अंतिम फैसला सुनाकर इसे लागू कराएगा।
क्या है केंद्र सरकार का नया कैशलेस फॉर्मूला
सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार की ओर से पेश प्रस्ताव के अनुसार हिमाचल प्रदेश को लंबित बकाये का भुगतान नकद राशि के बजाय बिजली के रूप में किया जाएगा। प्रस्ताव के तहत करीब 13,066 मिलियन यूनिट के कुल बकाये में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली हिमाचल प्रदेश को दी जाएगी।
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इसके बदले हिमाचल को पंजाब और हरियाणा को देय लगभग 420 करोड़ रुपये की पूंजीगत लागत का भुगतान नहीं करना होगा और इस राशि का समायोजन बिजली बकाये में ही कर दिया जाएगा। हिमाचल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में सटीक तर्क दिया कि जब पंजाब और हरियाणा ने खुद कभी केंद्र सरकार को पूंजीगत लागत का भुगतान नहीं किया, तो हिमाचल से इसकी मांग करना पूरी तरह बेबुनियाद है।
1966 से जारी संघर्ष और 2011 का ऐतिहासिक फैसला
हिमाचल प्रदेश को 1 नवंबर 2011 से तो उसका 7.19% हिस्सा मिल रहा है, लेकिन 1966 (भाखड़ा), 1977 (डहर) और 1978 (पोंग बांध) से लेकर 2011 तक के बकाया हिस्से (13,066 मिलियन यूनिट) से राज्य वंचित था।
12 अगस्त पर टिकीं सबकी निगाहें
अदालत ने पंजाब को याद दिलाया कि हिमाचल प्रदेश के पास पंजाब और हरियाणा जैसे विशाल वित्तीय संसाधन नहीं हैं। चूंकि नदियां और बांध हिमाचल की भूमि पर स्थित हैं, इसलिए राज्य के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। मामले की अगली और निर्णायक सुनवाई 12 अगस्त, 2026 को तय की गई है। अब पूरे मामले की निगाहें 12 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा बड़ा सहारा
यदि केंद्र सरकार का प्रस्ताव अंतिम रूप लेता है तो हिमाचल प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये के बराबर बिजली का लाभ मिलेगा। इससे राज्य की ऊर्जा जरूरतों को मजबूती मिलेगी, वित्तीय बोझ कम होगा और प्रदेश की आर्थिक स्थिति को भी बड़ा सहारा मिलेगा। विशेषज्ञ इसे हिमाचल के अधिकारों की लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मान रहे हैं।
