शिमला। हिमाचल प्रदेश में इस बार मानसून का मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है। राज्य में जुलाई के पहले सप्ताह के दौरान सामान्य से 18 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई है, जिससे फसलों और जनजीवन पर असर पड़ रहा है।
एक बूंद भी बारिश नहीं हुई
सबसे चौंकाने वाली स्थिति लाहौल-स्पीति जिले की रही, जहां पिछले एक हफ्ते में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई। अन्य पर्वतीय जिलों में भी बादल पर्याप्त नहीं बरस पाए हैं। चंबा में सामान्य से 59%, कुल्लू में 46%, किन्नौर में 42%, कांगड़ा में 9% और शिमला में 6% कम बारिश दर्ज की गई है।
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यहां जमकर बरसे बादल
इसके विपरीत राज्य के कुछ मैदानी और मध्यवर्ती जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा हुई है। ऊना में 91%, बिलासपुर में 25%, मंडी में 22%, सिरमौर में 13% और हमीरपुर में 19% अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई है। इस असमान बारिश के पीछे एक बड़ा कारण मानसून ट्रफ की दिशा को माना जा रहा है, जो उत्तर की ओर बढ़ने के बजाय दक्षिण दिशा में झुकाव दर्शा रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव हिमाचल में वर्षा की मात्रा को सीमित कर रहा है।
अगले 5 दिन भी राहत की उम्मीद नहीं
मौसम विभाग ने आगामी पांच दिनों के लिए भी भारी बारिश की संभावना से इनकार किया है। 9 और 10 जुलाई को ऊना, हमीरपुर, बिलासपुर, कांगड़ा, मंडी, सोलन और सिरमौर जिलों में हल्की वर्षा की संभावना जताई गई है, जबकि उसके बाद मानसून और कमजोर पड़ने के संकेत हैं। इसका असर न केवल खेती-बाड़ी पर पड़ेगा, बल्कि प्रदेश की जल संरक्षण योजनाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
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मानसून में अब तक 85 की मौत, 30 लापता
कम बारिश के बावजूद राज्य में प्राकृतिक आपदाओं की मार से लोग अछूते नहीं हैं। अब तक मानसून सीजन के दौरान 85 लोगों की जान जा चुकी है। इनमें से 14 की मौत बादल फटने, 8 की फ्लैश फ्लड, 9 की डूबने, 10 की ऊंचाई से गिरने, 3 की बिजली के करंट, 3 की सांप के काटने, 1 की आग से और 1 व्यक्ति की जान भूस्खलन के कारण गई है। इसके अतिरिक्त 31 लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई है। इस समय भी 30 लोग लापता हैं और उनकी खोज के लिए रेस्क्यू अभियान चलाया जा रहा है।
718 करोड़ की संपत्ति तबाह
प्राकृतिक आपदाओं के चलते हिमाचल प्रदेश में अब तक कुल 718 करोड़ रुपये की सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। सबसे ज्यादा असर राज्य की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ा है। राज्य में वर्तमान समय में 198 सड़कों पर यातायात पूरी तरह से ठप पड़ा है, जिनमें से 150 सड़कें अकेले मंडी डिवीजन में बंद हैं। इसके अलावा 159 बिजली ट्रांसफॉर्मर और 297 पेयजल योजनाएं भी ठप हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी और बिजली की भारी किल्लत पैदा हो गई है।
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चिंता का विषय बनी मानसूनी सुस्ती
मानसून की यह सुस्ती न केवल पर्यावरण बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है। खेती पर निर्भर हजारों किसान अब आसमान की ओर उम्मीद लगाए बैठे हैं। नदियों और जलाशयों का जलस्तर कम हो रहा है, जो भविष्य में पेयजल संकट को जन्म दे सकता है।
हिमाचल में मौसम की यह बदलती चाल न केवल जलवायु असंतुलन का संकेत है, बल्कि इससे जुड़ी आपदाएं यह भी दर्शा रही हैं कि राज्य को अब पहले से कहीं अधिक सतर्कता और आपदा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता है।
