कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू के राशेल गांव में किसानों ने मुश्किल हालात में बड़ी मिसाल पेश की है। यहां ग्रामीणों ने करीब 200 मीटर लंबे ग्लेशियर को काटकर सिंचाई कुहल को दोबारा चालू किया, जिससे सूख रहे खेतों तक पानी पहुंचना शुरू हो गया। कड़ी मेहनत और एकजुटता से गांव के लोगों ने साबित कर दिया कि हालात कितने भी कठिन हों, मेहनत से रास्ता निकाल ही लिया जाता है।

सदियों में सिचाई सप्लाई पर गिर गया था  ग्लेशियर

बता दे कि सर्दियों में बर्फबारी के समय करीब 10 फीट ऊंचा और लगभग 200 मीटर लंबा ग्लेशियर कुहल के ऊपर आ गिरा था, जिससे खेतों तक पानी पहुंचना पूरी तरह रुक गया था। खेती-बाड़ी के सीजन की शुरुआत के साथ जब किसानों को सिंचाई के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ी, तो ग्रामीणों ने खुद ही मोर्चा संभाला और कुहल को फिर से बहाल करने का काम शुरू किया।

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तीन घटें तक की कड़ा मेहनत 

बीते कल रविवार को गांव के लोगों ने मिलकर करीब तीन घंटे तक लगातार मेहनत की। इस दौरान उन्होंने ग्लेशियर के भारी मलबे को काटकर और हटाकर कुहल को साफ किया। कड़ाके की ठंड और कठिन परिस्थितियों के बावजूद ग्रामीणों ने हार नहीं मानी और एकजुट होकर इस काम को पूरा किया। इसके बाद अब खेतों तक पानी पहुंचना शुरू हो गया है, जिससे किसानों में राहत और खुशी दोनों देखी जा रही है।

हर साल देखने को मिलती है यह समस्या  

लोगों का कहना है कि यह समस्या हर साल सर्दियों में देखने को मिलती है। बर्फबारी के कारण कभी पानी की पाइपलाइन जम जाती है, तो कभी ग्लेशियर गिरने से सिंचाई कुहल बंद हो जाती है। लेकिन गांव के लोग हर बार मिलकर इसे ठीक कर लेते हैं और अपने खेतों तक पानी पहुंचाने में सफल रहते हैं।

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बारिश कम होने से सिंचाई पर निर्भर  हैं किसान

उन्होंने बताया कि इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही थे, लेकिन ग्रामीणों की मेहनत से कुहल को फिर से शुरू कर दिया गया है। अब किसानों को फसल की सिंचाई में कोई बड़ी परेशानी नहीं होगी। बता दे कि जैसे ही सर्दी खत्म होती है और कृषि सीजन शुरू होता है, लोग सबसे पहले कुहलों की सफाई और मरम्मत में जुट जाते हैं। क्योंकि लाहौल घाटी में बारिश बहुत कम होती है, इसलिए यहां की खेती पूरी तरह सिंचाई पर निर्भर रहती है।  ऐसे में कुहलों का ठीक रहना बहुत जरूरी होता है।

हर साल मिलकर करते हैं काम 

हर साल कई जगहों पर बर्फबारी के कारण पहाड़ों से ग्लेशियर का मलबा कुहलों पर गिर जाता है, जिसे हटाना ग्रामीणों के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इसके बावजूद भी लोग हर साल यह काम मिलकर करते हैं और खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था बनाए रखते हैं।

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गांव में 14 घरों की है आबादी 

राशेल गांव की आबादी भले ही सिर्फ 14 घरों की है, लेकिन यहां के लोगों की मेहनत और हौसला हमेशा बड़ा उदाहरण पेश करता है। सर्दियों में जब पेयजल की पाइपलाइन भी जम जाती है, तब भी ग्रामीण मिलकर उसे बहाल करते हैं और पानी की व्यवस्था बनाए रखते हैं।

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