शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में आउटसोर्स आधार पर 1,290 रोगी मित्रों की भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया पर रोक लगाकर सुक्खू सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगले आदेश तक न तो नए रोगी मित्रों की नियुक्ति की जाएगी और न ही उनकी तैनाती की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार की आउटसोर्स नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभागों में स्टाफ नर्सों के 1,535 नियमित पद खाली पड़े हैं, तो सरकार नियमित भर्ती करने के बजाय आउटसोर्स व्यवस्था के जरिए नया कैडर क्यों तैयार कर रही है।
1,000 रोगी मित्रों की तैनाती और 290 पदों की भर्ती पर रोक
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने बाल कृष्ण की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में स्वास्थ्य विभाग की उस योजना को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत स्टाफ नर्स के समान शैक्षणिक योग्यता रखने वाले 1,000 लोगों को अस्पतालों में आउटसोर्स आधार पर रोगी मित्र के रूप में तैनात किया जाना था। इन कर्मचारियों को प्रतिमाह 15,000 रुपये का निश्चित मानदेय देने का प्रावधान रखा गया था।
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इसके अलावा प्रदेश के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में 290 पदों को भरने के लिए 1 अगस्त 2026 को जारी किए गए मांग पत्र को भी अदालत में चुनौती दी गई थी। इस तरह कुल 1,290 रोगी मित्रों की भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया फिलहाल न्यायिक रोक के दायरे में आ गई है।
सरकार ने नीति पर पुनर्विचार की बात कही
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप-अधिवक्ता जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार रोगी मित्र नीति पर पुनर्विचार कर रही है। सरकार की ओर से यह आश्वासन भी दिया गया कि एक अन्य समान मामला अदालत में लंबित रहने तक इस नीति को लागू नहीं किया जाएगा। सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि अगले आदेश तक रोगी मित्रों की कोई नई भर्ती या तैनाती नहीं की जाएगी। अदालत के इस आदेश के बाद स्वास्थ्य विभाग की पूरी प्रक्रिया पर फिलहाल ब्रेक लग गया है।
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नियमित पद खाली, फिर आउटसोर्स भर्ती क्यों?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल नियमित पदों को लेकर उठाया। अदालत के समक्ष जानकारी आई कि स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभागों में स्टाफ नर्सों के 1,535 पद लंबे समय से खाली हैं। खंडपीठ ने सवाल किया कि जब विभाग में इतने बड़े पैमाने पर नियमित पद रिक्त हैं, तो सरकार उन पदों को भरने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय आउटसोर्स कर्मचारियों के माध्यम से अलग कैडर तैयार करने की दिशा में क्यों बढ़ रही है।
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समान काम के बदले महज 15 हजार मानदेय पर भी चिंता
हाईकोर्ट ने आउटसोर्स रोगी मित्रों से नियमित कर्मचारियों के समान काम लेने और इसके बदले केवल 15,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने पर भी चिंता जताई। अदालत ने माना कि इस प्रकार की व्यवस्था से युवाओं का शोषण बढ़ सकता है। खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि यदि आउटसोर्स कर्मचारियों से अस्पतालों में नियमित स्टाफ नर्सों के समान जिम्मेदारियां
निभाई जानी हैं, तो उनके वेतन, सेवा शर्तों और रोजगार सुरक्षा को लेकर क्या व्यवस्था होगी।
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कोर्ट की चिंता केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि कर्मचारियों के अधिकारों और उनके साथ होने वाले संभावित भेदभाव को लेकर भी रही। अदालत ने संकेत दिया कि समान काम के लिए असमान वेतन और अस्थिर रोजगार व्यवस्था को बिना उचित औचित्य के लागू नहीं किया जा सकता।
आउटसोर्स एजेंसियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आउटसोर्स एजेंसियों की कार्यप्रणाली पहले से ही न्यायिक जांच के दायरे में है। ऐसे में जब संबंधित मामला अदालत में लंबित है, उस दौरान नई आउटसोर्स नीति लागू करना उचित नहीं होगा। अदालत ने इस बात को भी गंभीरता से लिया कि लंबित न्यायिक कार्यवाही के बीच सरकार नई व्यवस्था लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही थी। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में भी देखा।'
