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September 4, 2026

हिमाचल के खजाने की बिगड़ी सेहत, वेतन-पेंशन, ब्याज पर 33266 करोड़ का खर्चा; सब्सिडी का लॉलीपोप....

हिमाचल पर कुल कर्ज 1.02 लाख करोड़ के पार, कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा बजट

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sukhu govt cag report

शिमला। छोटे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की आर्थिक सेहत को लेकर कैग रिपोर्ट ने गंभीर तस्वीर उजागर की है। प्रदेश पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है, जबकि सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा ऐसे खर्चों में जा रहा है जिन्हें टाला नहीं जा सकता। कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने के बाद विकास कार्यों के लिए सरकार के पास सीमित धनराशि ही बच रही है।

 

विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य के वित्त पर कैग की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी। रिपोर्ट में प्रदेश की लगातार बढ़ती देनदारियों, राजस्व घाटे और अनिवार्य खर्चों पर चिंता जताई गई है। कैग के आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय दबाव बढ़ने के साथ विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों की गुंजाइश लगातार सिमट रही है।

कमाई का बड़ा हिस्सा पहले ही तय खर्चों में जा रहा

प्रदेश की वित्तीय चुनौती का सबसे बड़ा कारण यह है कि सरकार की राजस्व प्राप्तियों का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। वर्ष 2024-25 में इन तीन मदों पर कुल 33,266 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ा। राजस्व के स्तर पर उपलब्ध संसाधनों में से विकास के लिए महज 14 फीसदी के आसपास राशि ही बच पाई। यानी सरकार के पास नई परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और विकास योजनाओं पर खर्च करने की गुंजाइश बेहद सीमित रह गई।

 

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चार साल में वेतन का खर्च 4 हजार करोड़ बढ़ा

कैग रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों के वेतन और मजदूरी पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ा है। वर्ष 2020-21 में यह खर्च 13,411 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 17,461 करोड़ रुपये हो गया। चार साल के भीतर वेतन पर खर्च में करीब 4 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि हुई। रिपोर्ट के मुताबिक इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजह छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना रही है।

पेंशन का बोझ भी लगातार बढ़ता गया

सरकार के खजाने पर पेंशन का दबाव भी कम नहीं हुआ है। वर्ष 2020-21 में पेंशन पर 6,088 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। वर्ष 2024-25 तक यह राशि बढ़कर 9,543 करोड़ रुपये हो गई। इस तरह महज चार साल के दौरान पेंशन खर्च में भी करीब 3,455 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई। बढ़ते वेतन और पेंशन खर्च ने सरकार के नियमित राजस्व पर दबाव और बढ़ा दिया है।

 

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कर्ज लिया तो ब्याज चुकाने का बोझ भी बढ़ा

हिमाचल सरकार के लिए कर्ज की बढ़ती राशि के साथ ब्याज भुगतान भी बड़ी चुनौती बन गया है। वर्ष 2020-21 में कर्ज के ब्याज पर करीब 4,828 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। वर्ष 2024-25 में यह रकम बढ़कर 6,260.93 करोड़ रुपये हो गई। इसका मतलब है कि सरकार को हर साल अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज की लागत चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है। कैग ने इसी स्थिति को प्रदेश की वित्तीय सेहत के लिए गंभीर संकेत माना है।

हिमाचल पर कुल कर्ज 1.02 लाख करोड़ के पार

कैग रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024-25 के अंत तक हिमाचल प्रदेश का कुल कर्ज करीब 1,02,187.62 करोड़ रुपये पहुंच गया। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी का लगभग 44 फीसदी है। इसी अवधि में सरकार ने करीब 24,100 करोड़ रुपये का नया आंतरिक कर्ज लिया, जबकि 18,091 करोड़ रुपये का पुराना कर्ज चुकाया गया। इसके बावजूद कुल देनदारियां लगातार बढ़ती गईं।

 

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राजकोषीय घाटा भी तय सीमा से काफी ऊपर

प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर दबाव का अंदाजा राजकोषीय घाटे से भी लगाया जा सकता है। वर्ष 2024-25 में हिमाचल का राजकोषीय घाटा 12,611.05 करोड़ रुपये रहा, जो जीएसडीपी का 5.44 फीसदी है। यह आंकड़ा हिमाचल प्रदेश राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में निर्धारित 3 फीसदी की सीमा से काफी अधिक है। यानी राज्य की आय और खर्च के बीच का अंतर तय वित्तीय सीमा से काफी आगे निकल चुका है।

राजस्व घाटा भी चिंता का बड़ा कारण

सिर्फ राजकोषीय घाटा ही नहीं, बल्कि राजस्व घाटे की स्थिति भी सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश का राजस्व घाटा 6,804.61 करोड़ रुपये रहा, जो जीएसडीपी का 2.94 फीसदी है। वहीं, राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियां 40,872.35 करोड़ रुपये रहीं, जबकि राजस्व खर्च 47,676.96 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यानी सरकार की नियमित आय अपने नियमित खर्च को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं रही।

 

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राजस्व जुटाने में भी सरकार पीछे

कैग ने बताया कि वर्ष 2024-25 में प्रदेश सरकार निर्धारित बजट अनुमान की तुलना में केवल 84.57 फीसदी राजस्व ही जुटा सकी। इससे करीब 2,328.68 करोड़ रुपये की कमी रही।

प्रदेश के कुल राजस्व में स्टेट जीएसटी, आबकारी और राज्य कर की हिस्सेदारी सबसे अहम है। इन तीन स्रोतों से राज्य को करीब 81 फीसदी राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में इन स्रोतों से आय बढ़ाना और खर्च को नियंत्रित करना सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

कैग की सबसे बड़ी चिंता- कर्ज लेकर कर्ज का खर्च चलाना

कैग ने राज्य की वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कर्ज के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक उधार लिया गया पैसा आदर्श रूप से पूंजी निर्माण और विकास कार्यों में लगाया जाना चाहिए। यदि कर्ज लेकर मौजूदा खर्च पूरे किए जाएं और पुराने कर्ज का ब्याज चुकाया जाए तो यह स्वस्थ वित्तीय परंपरा नहीं मानी जा सकती। लगातार बढ़ते अनिवार्य खर्चों के कारण सरकार के पास विकास के लिए संसाधन कम होते जा रहे हैं।

 

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सब्सिडी का बोझ भी खजाने पर बढ़ा

प्रदेश सरकार की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में दी जाने वाली सब्सिडी भी वित्तीय दबाव का एक कारण बन रही है। वर्ष 2020-21 में सब्सिडी पर 1,280 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1,872 करोड़ रुपये हो गए। एचआरटीसी, बिजली बोर्ड और खाद्य क्षेत्र समेत कई मदों में सरकार को अनुदान देना पड़ता है। कैग ने सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक इसे सीमित करने की जरूरत बताई है।

365 में से सिर्फ 203 दिन बना रहा पर्याप्त नकद बैलेंस

राज्य के कोषागार की स्थिति को लेकर सामने आया आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला है। कैग के अनुसार सरकार वर्ष 2024-25 में 365 दिनों में से केवल 203 दिन ही ट्रेजरी में रोजाना नकद बैलेंस बनाए रखने में सफल रही। स्थिति यहां तक पहुंची कि पूरे वर्ष के दौरान 42 बार ओवरड्राफ्ट की नौबत आई। 

 

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विकास के लिए पैसा जुटाना सरकार के सामने बड़ी चुनौती

कैग रिपोर्ट की पूरी तस्वीर देखें तो हिमाचल सरकार के सामने चुनौती सिर्फ बढ़ते कर्ज की नहीं है, बल्कि बढ़ते अनिवार्य खर्च और घटती विकास क्षमता की भी है। वेतन, पेंशन, ब्याज, सब्सिडी और अन्य प्रतिबद्ध खर्चों के कारण राजस्व का बड़ा हिस्सा पहले ही निर्धारित मदों में चला जा रहा है।

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