कुल्लू। हिमाचल प्रदेश में भांग की खेती को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चा के बीच अब प्रदेश सरकार ने इससे संबंधित पॉलिसी लागू कर दी है। हिमाचल कैबिनेट में विस्तार होने वाला है- जिसमें संभावित मंत्री सुंदर सिंह ठाकुर ने ये बयान दिया है।
हिमाचल में भांग की खेती के नियम बदले
उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सरकार ने भांग की खेती को नियंत्रित तरीके से शुरू करने के लिए नियम और शर्तें निर्धारित की हैं। इसके तहत खेती से लेकर फसल की निगरानी, भंडारण और बिक्री तक की प्रक्रिया प्रशासनिक नियंत्रण में रहेगी।
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क्या बोले सुंदर सिंह ठाकुर?
विधायक के अनुसार, भांग की खेती को लेकर सरकार की ओर से गठित कमेटी में विभिन्न राजनीतिक दलों के विधायकों ने भी इस दिशा में समर्थन दिया था। कमेटी में भाजपा विधायकों डॉ. जनक राज और डॉ. हंसराज के अलावा सुरेंद्र शौरी तथा पूर्ण चंद ठाकुर के नाम भी शामिल रहे हैं।
दवाइयों और रोजगार के लिए खेती को बढ़ावा देने का दावा
सुंदर सिंह ठाकुर ने कहा कि भांग की खेती का उद्देश्य केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे दवा उद्योग और कई अन्य क्षेत्रों को भी लाभ मिलने की संभावना है। उनके मुताबिक, भांग से प्राप्त होने वाले विभिन्न उत्पादों का इस्तेमाल औषधीय और औद्योगिक कार्यों में किया जा सकता है।
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भांग से बनेंगी दवाइयां
उन्होंने दावा किया कि भांग से अल्जाइमर, कैंसर, ट्यूमर सहित कई बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के निर्माण पर काम हो रहा है। उनका कहना है कि वर्तमान में ऐसी कई दवाएं दूसरे देशों से आती हैं, लेकिन देश में बड़ी फार्मा कंपनियां यदि इसके लिए प्लांट स्थापित करती हैं तो भविष्य में भारत में ही इनका उत्पादन संभव होगा।
कॉस्मेटिक और हैंडलूम भी होगा तैयार
इसके अलावा भांग से कॉस्मेटिक और हैंडलूम से जुड़े उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं भी बताई गई हैं। इनमें रस्सी, कपड़ा, जूते और शॉल जैसे उत्पाद शामिल हैं। इससे किसानों के लिए खेती का एक अतिरिक्त विकल्प तैयार होने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
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1000 रुपये प्रति बीघा शुल्क पर खेती की अनुमति
विधायक के अनुसार, किसानों को निर्धारित शुल्क जमा करने के बाद भांग की खेती करने की अनुमति दी जाएगी। इसके लिए 1000 रुपये प्रति बीघा शुल्क तय किया गया है। हालांकि खेती करने के लिए किसानों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत लाइसेंस हासिल करना होगा।
अवैध कारोबार पर होगी निगरानी
सरकार का तर्क है कि नियंत्रित और लाइसेंस आधारित खेती से जहां इसके औद्योगिक एवं औषधीय इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं अवैध तरीके से भांग की खेती और इसके दुरुपयोग पर भी निगरानी रखी जा सकेगी।
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कृषि विभाग जारी करेगा लाइसेंस
भांग की खेती के लिए लाइसेंस जारी करने की जिम्मेदारी कृषि विभाग को दी गई है। लाइसेंस जारी करने से पहले कृषि विभाग के साथ आबकारी विभाग की अनुशंसा भी जरूरी होगी। यानी इच्छुक किसान सीधे खेती शुरू नहीं कर सकेंगे, बल्कि उन्हें निर्धारित विभागीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
लाइसेंस की वैधता एक वर्ष की होगी। अवधि पूरी होने के बाद नियमों के तहत इसे दोबारा नवीनीकृत कराया जा सकेगा। इस व्यवस्था के जरिए प्रशासन के पास लाइसेंसधारी उत्पादकों का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा और खेती के क्षेत्र की निगरानी भी संभव होगी।
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खेती वाले क्षेत्र में बाड़बंदी जरूरी
भांग की खेती के लिए निर्धारित जमीन की सुरक्षा को लेकर भी नियम बनाए गए हैं। खेती वाले क्षेत्र में बाड़बंदी करना अनिवार्य होगा, ताकि फसल तक अनधिकृत पहुंच को रोका जा सके।
इसके अलावा भांग की खेती पॉलीहाउस में भी की जा सकती है। पॉलीहाउस में प्रवेश और निकासी की व्यवस्था को लेकर भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसके अंदर केवल निर्धारित प्रवेश द्वार होगा, जबकि बाहर निकलने के लिए अलग द्वार की व्यवस्था रहेगी। पॉलीहाउस में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि खेती वाले क्षेत्र में किस व्यक्ति ने प्रवेश किया और कब बाहर निकला।
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CCTV और जियो टैगिंग से होगी निगरानी
भांग की खेती को लेकर निगरानी व्यवस्था को काफी सख्त रखने की बात कही गई है। निर्धारित क्षेत्र में CCTV कैमरों के जरिए निगरानी की जाएगी। इसके साथ ही खेती वाले क्षेत्र की जियो टैगिंग भी की जाएगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लाइसेंस जिस क्षेत्र के लिए जारी हुआ है, खेती उसी निर्धारित जगह पर हो। निगरानी के प्रावधानों से फसल की स्थिति और खेती के क्षेत्र पर नजर रखना भी संभव होगा।
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कटाई के बाद स्टोरेज पर भी नियंत्रण
भांग की फसल तैयार होने के बाद उसकी कटाई और भंडारण को लेकर भी नियम लागू होंगे। उत्पादक अपनी फसल को किसी भी सामान्य गोदाम या निजी स्थान पर नहीं रख सकेंगे। इसके लिए केवल अधिकृत और लाइसेंस प्राप्त स्टोर या वेयरहाउस का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इन भंडारण केंद्रों की निगरानी भी CCTV के माध्यम से किए जाने का प्रावधान है। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास होगा कि तैयार फसल निर्धारित स्थान पर ही सुरक्षित रखी जाए और उसकी अवैध तरीके से बिक्री या इस्तेमाल न हो।
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बिक्री के लिए भी लेनी होगी अनुमति
खेती करने और फसल को स्टोर करने के अलावा उत्पादित भांग की बिक्री के लिए भी संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेना आवश्यक होगा। यानी लाइसेंस मिलने के बाद भी उत्पादक अपनी फसल को मनमाने तरीके से बेच नहीं सकेंगे। पूरी प्रक्रिया में उत्पादन, भंडारण और बिक्री का रिकॉर्ड बनाए रखने पर जोर दिया गया है। इससे प्रशासन को फसल की पूरी सप्लाई चेन पर नजर रखने में मदद मिलेगी।
नियम तोड़े तो लाइसेंस रद्द
भांग की खेती के लिए निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। यदि कोई उत्पादक लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन करता है या निर्धारित नियमों के बाहर जाकर खेती, भंडारण अथवा बिक्री करता पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
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NDPS एक्ट में कार्रवाई
गंभीर उल्लंघन की स्थिति में आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट के तहत भी कार्रवाई का प्रावधान रहेगा। इससे साफ है कि सरकार नियंत्रित खेती की अनुमति देने के साथ-साथ इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए निगरानी और कानूनी कार्रवाई की व्यवस्था भी रख रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
सुंदर सिंह ठाकुर के मुताबिक, नियंत्रित तरीके से भांग की नियंत्रित तरीके से भांग की खेती शुरू होने से किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है। औषधीय उपयोग के अलावा इससे जुड़े उद्योगों के विकसित होने पर खेती, प्रसंस्करण और उत्पाद निर्माण के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना है।
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रिकॉर्ड भी पूरा रखा जाएगा
हालांकि, इस पूरी व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अवैध इस्तेमाल को रोकना और लाइसेंस प्राप्त खेती को सख्त निगरानी में रखना होगी। सरकार द्वारा लाइसेंस, जियो टैगिंग, CCTV, बाड़बंदी, रिकॉर्ड रखने और अधिकृत स्टोरेज जैसे प्रावधान इसी उद्देश्य से किए गए हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई पॉलिसी जमीन पर किस तरह लागू होती है और किसानों को इसका कितना लाभ मिलता है।
