सिरमौर। कहते हैं कि सच्चा प्यार न तो दूरी देखता है और न ही भाषा या परंपराओं की दीवार उसे रोक पाती है। हिमाचल प्रदेश के नाहन (जमटा) और असम के सोनितपुर जिले के बीच लगभग 2300 किलोमीटर की दूरी होने के बावजूद एक ऐसा रिश्ता जुड़ा है, जिसने लोगों का दिल जीत लिया है। 

अक्षय-नेहा की शादी, हिमाचल-असम का मिलन

नाहन के पास जमटा गांव में रहने वाले अक्षय, जो अनिल कुमार और सीमा देवी के बेटे हैं, उन्होंने असम की रहने वाली नेहा (जो स्वर्गीय गौतम करमाकर और सुनीता करमाकर की बेटी हैं) के साथ शादी कर ली है और अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की है। यह शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग राज्यों की संस्कृति, परंपराओं और रहन-सहन का एक अच्छा सा मेल बन गई है।

 

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हिमाचल और असम की संस्कृति का अपनापन

एक तरफ हिमाचल की शांत पहाड़ी वादियां, सादगी भरा जीवन और देव संस्कृति की झलक है,  वहीं दूसरी तरफ असम में रंग-बिरंगे त्योहार, लोक-संस्कृति और अलग-अलग रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिलती है। इन दोनों जगहों की सोच, रहन-सहन और परंपराएं भले ही अलग हों, लेकिन जब बात रिश्तों की आई तो दोनों परिवारों ने दिल खोलकर इसे अपनाया। बिना किसी फर्क के, पूरे सम्मान और अपनापन के साथ इस रिश्ते को स्वीकार किया गया।    

नाहन में स्वागत समारोह, नवविवाहित जोड़े को मिला आशीर्वाद

इस विशेष अवसर पर 24 जून 2026 (बुधवार) को नाहन के जमटा क्षेत्र में पटवार भवन के समीप एक भव्य स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में दोनों परिवारों के सदस्य, रिश्तेदार और कई स्थानीय लोग मौजूद रहे। सभी ने नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना की।

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पहनावा अलग, लेकिन दिल एक जैसे

समारोह में मौजूद लोगों ने इस शादी को “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” की एक सच्ची मिसाल बताया। उनका कहना था कि आज के समय में देश में दूरियां तो सिर्फ नक्शे तक ही रह गई हैं, असल में लोग अब दिलों से बहुत करीब आ रहे हैं। लोगों ने ये भी कहा कि चाहे भाषा अलग हो, पहनावा अलग हो या खाने-पीने की आदतें अलग हों, लेकिन जब बात प्यार, भरोसे और रिश्तों की आती है तो हर जगह सोच एक जैसी ही होती है। कहीं भी जाएं, रिश्तों की अहमियत और अपनापन हमेशा एक जैसा ही रहता है।

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हिमाचल की ठंडी हवाओं और असम की हरियाली के बीच बना ये रिश्ता लोगों को यही सिखाता है कि जब दो दिल सच में जुड़ जाते हैं, तो दूरी का कोई मतलब नहीं रह जाता। फिर तो पूरा भारत एक परिवार जैसा लगने लगता है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और अपनापन हर जगह एक जैसा ही होता है।