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August 10, 2026
चंबा हा*दसा: पत्नी का संस्कार कर बेटियों से मिलने अस्पताल पहुंचा पिता, मासूमों के सवालों पर रो पड़ा
पिता से मासूम ने पूछा सवाल मां नहीं आई बेबस पिता नहीं दे पाया कोई जवाब
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चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिला में हुआ दर्दनाक बस हादसा कई परिवारों को ऐसे जख्म दे गया है, जिन्हें भर पाना शायद कभी आसान नहीं होगा। बैरागढ़-तीसा मार्ग पर हुए हादसे में किसी ने अपना सहारा खो दिया तो किसी ने अपना। लेकिन इस हादसे की सबसे दिल दहला देने वाली तस्वीर चंबा अस्पताल में देखने को मिल रही है, जहां चार घायल मासूम बेटियां अपनी मां को तलाश रही हैं। उन्हें अब भी यही उम्मीद है कि मां आएगी, उन्हें गले लगाएगी और प्यार से उनके सिर पर हाथ फेरेगी।
लेकिन उन्हें क्या पता कि जिस मां का वे इंतजार कर रही हैं, वह अब कभी वापस नहीं आएगी। पत्नी नीलमा के अंतिम संस्कार के बाद जब पिता मोती सिंह रविवार को अपनी घायल बेटियों से मिलने अस्पताल पहुंचे तो बच्चों को देखते ही उनका कलेजा फट पड़ा। बेटियों को देखकर आंखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन सबसे मुश्किल पल तब आया जब मासूम बेटी ने पिता से मां के बारे में पूछ लिया। इस सवाल का जवाब मोती सिंह के पास था ही नहीं।
चंबा अस्पताल में उपचाराधीन चारों बच्चियों को अभी तक पूरी तरह समझ नहीं आया है कि उनके जीवन में कितना बड़ा बदलाव आ चुका है। उनके लिए मां का अचानक नजरों से ओझल होना ही सबसे बड़ा सवाल है। मासूम बच्चियां अस्पताल में अपने पिता और आसपास मौजूद लोगों से मां के बारे में पूछती हैं। उन्हें लगता है कि मां कहीं गई हैं और जल्द ही वापस आकर उन्हें अपने सीने से लगा लेंगी। लेकिन हकीकत यह है कि हादसे ने उनसे मां का साया हमेशा के लिए छीन लिया है।
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पत्नी के अंतिम संस्कार के बाद मोती सिंह जब अस्पताल में बेटियों के पास पहुंचे तो भावनाओं का बांध टूट गया। एक तरफ पत्नी को खोने का असहनीय दर्द था और दूसरी तरफ घायल बेटियां उनके सामने थीं। सबसे छोटी बेटी प्रियंका ने जब मां के बारे में पूछा तो पिता कुछ बोल नहीं पाए। जिस सवाल का जवाब एक मां शायद प्यार से अपनी बेटी को दे देती, उसी सवाल ने पिता को भीतर तक तोड़ दिया। मोती सिंह बेटियों को देखते रहे और आंखों से आंसू बहते रहे।
मोती सिंह ने बेटियों को गले लगाया, उन्हें दुलार दिया और उनका हौसला बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मासूम बच्चियों को कैसे बताया जाए कि उनकी मां अब कभी लौटकर नहीं आएगी।
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हादसे के वक्त मोती सिंह पांगी में मजदूरी कर रहा था। शनिवार को जब गांव से लोगों के फोन आने लगे और उसे घर बुलाया गया तो उसे किसी अनहोनी की आशंका होने लगी। वह पांगी मुख्यालय किलाड़ पहुंचा और इंटरनेट चालू करने के बाद जब हादसे की खबर देखी तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। कुछ ही देर बाद उसे पत्नी नीलमा की मौत की खबर भी मिल गई। जिस परिवार के लिए वह दूर रहकर मजदूरी कर रहा था, उसी परिवार पर अचानक इतनी बड़ी त्रासदी टूट चुकी थी।
पत्नी की मौत की खबर सुनने के बाद मोती सिंह पूरी तरह टूट गया। उसे यह डर सताने लगा कि कहीं हादसे में उसकी बेटियों को भी कुछ न हो गया हो। उसने गांव और रिश्तेदारों से परिवार की स्थिति जानने की कोशिश की। उस समय उसके सामने जिंदगी का सबसे भयावह सच था—एक तरफ पत्नी को खोने का सदमा और दूसरी तरफ अपनी मासूम बेटियों की चिंता।
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अत्यधिक दुख और सदमे की स्थिति में मोती सिंह ने अपने करीबियों के सामने अपने टूट जाने की बात कही। परिजनों और गांव के लोगों ने उसे संभाला और समझाया कि उसे अपनी बेटियों के लिए मजबूत रहना होगा। लोगों के समझाने के बाद वह घर पहुंचा और पत्नी नीलमा को अंतिम विदाई दी। जिस पत्नी के साथ उसने जिंदगी बिताने के सपने देखे थे, उसी को अपने हाथों से अंतिम विदाई देना उसके जीवन का सबसे भारी पल रहा होगा।
पत्नी का अंतिम संस्कार करने के बाद भी मोती सिंह को चैन नहीं मिला। उसकी चारों बेटियां अस्पताल में भर्ती थीं। रविवार को वह सीधे चंबा अस्पताल पहुंचा और बेटियों को देखा। बेटियों को सामने देखकर उसकी आंखें भर आईं। वह उन्हें संभालने की कोशिश करता रहा, लेकिन खुद भीतर से बिखर चुका था। एक तरफ पत्नी की याद और दूसरी तरफ बेटियों की मासूम निगाहें—इस दर्द को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
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अस्पताल में चारों बच्चियों की निगाहें शायद हर बार दरवाजे की तरफ उठती होंगी। उन्हें उम्मीद होगी कि मां आएगी और उन्हें अपने पास बैठाएगी। लेकिन अब उनके इंतजार का कोई अंत नहीं है। पिता के सामने सबसे कठिन जिम्मेदारी यही है कि वह अपनी बेटियों को संभाले, उनके सवालों का सामना करे और उन्हें धीरे-धीरे उस सच्चाई से परिचित करवाए, जिसे स्वीकार करना उसके लिए खुद भी संभव नहीं हो पा रहा।