हमीरपुर। “ऐ मेरे वतन के लोगों… कुछ याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आए।” स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ये पंक्तियां हिमाचल प्रदेश के उन वीर सपूतों की याद दिलाती हैं, जिन्होंने तिरंगे की आन, बान और शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। देवभूमि और वीरभूमि हिमाचल प्रदेश के हजारों जवानों ने आजादी के बाद से देश की रक्षा के लिए अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया है।

 

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, आजादी के बाद से अब तक हिमाचल प्रदेश के 1738 वीर जवान देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए हैं। इनमें प्रदेश के लगभग हर जिले के सपूत शामिल हैं। किसी ने बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों पर दुश्मन से लोहा लेते हुए प्राण गंवाए तो किसी ने आतंकवाद विरोधी अभियानों में मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। इन वीरों की शहादत केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हिमाचल की उस गौरवशाली सैन्य परंपरा की कहानी है, जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी।

शहादत के आंकड़ों में कांगड़ा सबसे आगे

हिमाचल के जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो कांगड़ा जिला सबसे आगे है। यहां के 743 वीर जवानों ने देश की रक्षा करते हुए शहादत दी है। इसके बाद हमीरपुर के 349 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है। पूर्व सैनिक कल्याण निदेशालय हमीरपुर के आंकड़ों के अनुसार बिलासपुर के 149, चंबा के 48, कुल्लू के 14, लाहौल-स्पीति के 8, मंडी के 171, शिमला के 33, किन्नौर के 6, सिरमौर के 46, सोलन के 34 और ऊना के 137 जवान भी देश के लिए शहीद हुए हैं।

 

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यानी हिमाचल का शायद ही कोई ऐसा कोना है, जहां किसी परिवार ने देश की रक्षा के लिए अपना लाल न दिया हो। पहाड़ों के गांवों से निकले इन जवानों ने सरहदों पर जाकर भारत माता की रक्षा का संकल्प निभाया और जरूरत पड़ने पर हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

 

किसी ने तिरंगे के लिए, किसी ने सरहद पर खाईं गोलियां

हिमाचल के इन वीरों की शहादत की कहानी कई युद्धों और सैन्य अभियानों से जुड़ी है। आजादी के बाद पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों से लेकर सियाचिन की जमा देने वाली ठंड, श्रीलंका के ऑपरेशन और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ अभियानों तक हिमाचली जवानों ने हर मोर्चे पर अपनी वीरता का परिचय दिया। इन वीरों ने सिर्फ सीमा की रक्षा नहीं की, बल्कि देश के करोड़ों लोगों के सुरक्षित जीवन की कीमत अपने खून से चुकाई।

1947-49 के युद्ध में 136 जवान शहीद

आजादी के बाद 1947 से 1949 के बीच पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में हिमाचल प्रदेश के 136 जवानों ने वीरगति प्राप्त की। देश को आजादी मिलने के तुरंत बाद ही हिमाचल के सपूतों ने सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली थी। इसके बाद 1965 से 1967 के बीच पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में प्रदेश के 344 जवानों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

 

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1971 के युद्ध में 259 हिमाचली वीरों ने दी शहादत

वर्ष 1971 का भारत-पाक युद्ध भी हिमाचल के सैन्य इतिहास में शहादत से भरा अध्याय है। इस युद्ध में प्रदेश के 259 जवानों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए प्राण न्योछावर किए। 
इन जवानों के बलिदान ने यह साबित किया कि पहाड़ों के छोटे-छोटे गांवों से निकलने वाले बेटे जब वर्दी पहनते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता देश और तिरंगा होता है।

 

सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर 49 वीर हुए शहीद

वर्ष 1984 में सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत शुरू किया। दुनिया के सबसे कठिन सैन्य क्षेत्रों में से एक सियाचिन में दुश्मन से मुकाबले के साथ मौसम भी सैनिकों की परीक्षा लेता है। इस अभियान के दौरान हिमाचल के 49 जवानों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। बर्फीली चोटियों पर देश की सीमा की रक्षा करते हुए इन वीरों की शहादत हिमाचल की सैन्य परंपरा का गौरवशाली अध्याय है।

 

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ऑपरेशन पवन में हिमाचल के 39 जवानों ने दी कुर्बानी

वर्ष 1987 में श्रीलंका में चलाए गए ऑपरेशन पवन के दौरान भी हिमाचल के जवानों ने अदम्य साहस दिखाया। इस अभियान में प्रदेश के 39 जवान शहीद हुए। हिमाचल के इन सैनिकों ने हजारों किलोमीटर दूर जाकर भी देश के आदेश और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा।

कारगिल की चोटियों पर 57 वीरों ने लिखा शहादत का इतिहास

वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध देश के सैन्य इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे शायद ही कोई भारतीय कभी भूल सके। दुर्गम पहाड़ियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों और सैनिकों से मुकाबला करते हुए भारतीय जवानों ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। कारगिल युद्ध में हिमाचल प्रदेश के 57 वीर जवानों ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। इन शहीदों में कैप्टन विक्रम बत्रा जैसे वीर भी शामिल रहे, जिनका नाम आज भी पूरे देश में अदम्य साहस और देशभक्ति का प्रतीक है।

 

ऑपरेशन पराक्रम में 77 जवान हुए शहीद

भारतीय संसद पर आतंकी हमले के बाद शुरू किए गए ऑपरेशन पराक्रम के दौरान भी हिमाचल के जवानों ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अभियान में प्रदेश के 77 जवानों ने शहादत दी। 

 

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ऑपरेशन रक्षक में सबसे अधिक हिमाचली जवानों की शहादत

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन रक्षक में हिमाचल प्रदेश के सबसे अधिक जवानों ने शहादत दी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस अभियान में प्रदेश के 383 जवानों ने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय तक चले इस अभियान में हिमाचल के जवानों ने कठिन परिस्थितियों में मोर्चा संभाला और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी अपना जीवन समर्पित किया।

दूसरे अभियानों में भी 210 जवानों ने दिया सर्वोच्च बलिदान

इन प्रमुख युद्धों और अभियानों के अलावा विभिन्न सैन्य अभियानों के दौरान भी हिमाचल प्रदेश के 210 जवान शहीद हुए। यानी प्रदेश के वीर सपूतों की शहादत की यह गाथा किसी एक युद्ध या किसी एक सीमा तक सीमित नहीं रही। समय-समय पर जब भी देश को अपने जवानों की जरूरत पड़ी, हिमाचल के युवाओं ने सबसे आगे बढ़कर वर्दी पहनी और राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया।

पहाड़ों के घरों से निकले लाल, देश की सीमाओं के प्रहरी बने

हिमाचल के गांवों में सेना में जाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। कई परिवारों की पीढ़ियां सेना में सेवा देती रही हैं। किसी घर का बेटा सीमा पर तैनात है तो किसी घर में शहीद की तस्वीर आज भी परिवार के लिए गौरव का प्रतीक बनी हुई है। इन 1738 जवानों की शहादत हमें याद दिलाती है कि आजादी सिर्फ एक तारीख नहीं है। इसके पीछे अनगिनत परिवारों की कुर्बानियां, माताओं की आंखों के आंसू और वीर जवानों का बहाया हुआ खून है।

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