मंडी। हिमाचल प्रदेश में साइबर ठग अब सिर्फ भोले-भाले लोगों को ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे और अनुभवी नागरिकों को भी अपने जाल में फंसाकर बड़ी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। ताजा मामला जिला मंडी से सामने आया है, जहां एक रिटायर्ड अधिकारी को “डिजिटल अरेस्ट” जैसे फर्जी डर में फंसाकर साइबर ठगों ने करीब 1 करोड़ 14 लाख रुपये की ठगी कर ली।

वीडियो कॉल से शुरू हुई ठगी की कहानी

पूरा मामला एक साधारण वीडियो कॉल से शुरू हुआ, जिसमें ठगों ने खुद को कभी प्रवर्तन निदेशालय (ED), कभी क्राइम ब्रांच और कभी अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारी के रूप में पेश किया।

 

यह भी पढ़ें : धर्मशाला MC: मेयर चुनाव से पहले तीन BJP पार्षदों पर अतिक्रमण का डंडा, कांग्रेस बिगाड़ सकती है समीकरण!

 

उन्होंने बेहद गंभीर और दबंग अंदाज में रिटायर्ड अफसर को बताया कि उनका नाम एक बड़े आर्थिक अपराध की जांच में सामने आया है और उनके खिलाफ जल्द ही कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी डर और दबाव का इस्तेमाल करके ठगों ने उन्हें मानसिक रूप से इतना कमजोर कर दिया कि उन्होंने हर बात को सच मान लिया।

डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर दो महीने तक कंट्रोल में रखा

इसके बाद ठगों ने “डिजिटल अरेस्ट” का नया डर दिखाया। उन्होंने कहा कि अधिकारी अब जांच के दायरे में हैं और उनकी हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा रही है। उन्हें यह भी निर्देश दिया गया कि वे किसी भी व्यक्ति से संपर्क नहीं करेंगे, घर से बाहर नहीं निकलेंगे और सिर्फ “जांच एजेंसी” के आदेशों का पालन करेंगे। धीरे-धीरे यह स्थिति ऐसी बन गई कि पीड़ित पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कट गए और लगभग दो महीने तक ठगों के इशारों पर चलते रहे।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल: उल्टी करने कार से उतरी महिला, पहाड़ी से गिरे पत्थरों की चपेट में आने से मौ*त- साथ था परिवार

वेरिफिकेशन” के नाम पर धीरे-धीरे पैसे निकलवाए

इसी दौरान ठगों ने “वेरिफिकेशन प्रक्रिया” के नाम पर अगला खेल शुरू किया। उन्होंने कहा कि बैंक खातों में मौजूद रकम संदिग्ध है और उसकी जांच के लिए उसे “सरकारी निगरानी वाले खातों” में ट्रांसफर करना जरूरी है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता है और जांच पूरी होने के बाद पूरी रकम सुरक्षित रूप से वापस कर दी जाएगी। इस भरोसे और डर के मिश्रण में फंसकर रिटायर्ड अधिकारी ने धीरे-धीरे अपने बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर करना शुरू कर दिया।

सच सामने आने तक हो चुकी थी बहुत देर 

ठगों ने बहुत चालाकी से पूरी प्रक्रिया को लंबा खींचा और कई किस्तों में पैसे निकलवाए। यह ट्रांजेक्शन 3 नवंबर 2025 से 2 जनवरी 2026 के बीच अलग-अलग चरणों में चलता रहा, जिसमें कुल मिलाकर 1.14 करोड़ रुपये ठगों द्वारा बताए गए खातों में भेज दिए गए। इस दौरान पीड़ित को लगातार यही विश्वास दिलाया जाता रहा कि वे किसी सरकारी जांच का हिस्सा हैं और उनका पैसा सुरक्षित है।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल में मानसून ने पकड़ी रफ्तार, 72 घंटे भारी बारिश का अलर्ट जारी

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इतने लंबे समय तक न तो पीड़ित को कोई शक हुआ और न ही उन्हें यह समझ आया कि वे किसी सरकारी एजेंसी के नहीं बल्कि साइबर अपराधियों के जाल में फंसे हैं। ठगों ने इस दौरान मनोवैज्ञानिक दबाव, डर और फर्जी अधिकारिक भाषा का इस्तेमाल करके पूरी स्थिति को बेहद वास्तविक बना दिया था।

पुलिस कर रही मामले की जांच 

जब निर्धारित समय के बाद भी न तो पैसा वापस आया और न ही कथित जांच अधिकारियों से कोई संपर्क हुआ, तब जाकर रिटायर्ड अफसर को सच्चाई का अंदाजा हुआ। इसके बाद उन्होंने तुरंत जिला मंडी साइबर क्राइम पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाई और पूरा मामला पुलिस के संज्ञान में आया। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और ठगों के नेटवर्क, बैंक खातों और कॉल डिटेल्स की जांच की जा रही है।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल : सास-देवर से परेशान महिला ने निगला ज.हर, अस्पताल में मौ*त से पहले पुलिस को दिया बयान

लिस की सख्त चेतावनी

इस घटना के बाद पुलिस प्रशासन ने लोगों को सख्त चेतावनी जारी की है। पुलिस ने साफ किया है कि “डिजिटल अरेस्ट” नाम की कोई भी कानूनी प्रक्रिया नहीं होती। कोई भी जांच एजेंसी, चाहे वह ED हो, क्राइम ब्रांच हो या कोई अन्य विभाग, वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार करने या पैसे ट्रांसफर करवाने का अधिकार नहीं रखती। ऐसे सभी कॉल पूरी तरह फर्जी और साइबर फ्रॉड का हिस्सा होते हैं।

यह भी पढ़ें : हिमाचल: पेट्रोल-डीजल को लेकर बड़ी राहत, आज से 200 लीटर से ज्यादा भरवा सकेंगे टंकी- पहले थी लिमिट

पुलिस ने खासकर बुजुर्गों, रिटायर्ड कर्मचारियों और नौकरीपेशा लोगों से अपील की है कि वे ऐसी किसी भी कॉल से न डरें और न ही किसी अनजान व्यक्ति के दबाव में आएं। किसी भी स्थिति में बैंक डिटेल, OTP या पैसे साझा न करें और तुरंत राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें या नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन से संपर्क करें।