शिमला। हिमाचल प्रदेश में खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने और खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी में अवसर देने वाली खेल नीति अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। मामला एक ऐसे युवा वॉलीबॉल खिलाड़ी का है, जिसने महज 17 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और विश्व चैंपियनशिप में भारतीय टीम की कप्तानी तक की। इसके बावजूद उसके इंटरनेशनल स्तर के प्रमाणपत्र को सरकारी नौकरी में खेल कोटे के लिए मान्यता नहीं मिली।
वहीं, हैरानी की बात यह है कि वॉलीबॉल में नेशनल स्तर के प्रमाणपत्र को मान्यता दी जा रही है। इस विरोधाभासी स्थिति ने खेल विभाग की कार्यप्रणाली के साथ-साथ हिमाचल की मौजूदा स्पोर्ट्स पॉलिसी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
देश का प्रतिनिधित्व करने वाले के सर्टिफिकेट अमान्य
बिलासपुर जिले के 17 वर्षीय प्रतिभाशाली वॉलीबॉल खिलाड़ी शब्द गौतम का मामला सामने आने के बाद खेल जगत में चर्चा तेज हो गई है। शब्द इतनी कम उम्र में चार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हाल ही में चीन में संपन्न हुई अंडर-17 वर्ल्ड चैंपियनशिप में शब्द भारतीय टीम के कप्तान के रूप में मैदान पर उतरे। देश की जर्सी पहनकर विश्व स्तर की प्रतियोगिता में खेलने वाले इस युवा खिलाड़ी को उम्मीद थी कि उसकी उपलब्धियों को हिमाचल में भी उचित सम्मान और भविष्य में सरकारी नौकरी के खेल कोटे का लाभ मिलेगा। लेकिन खेल विभाग में दस्तावेज जमा कराने पहुंचे उनके परिवार को जो जवाब मिला, उससे वे मायूस होकर लौटे।
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दस्तावेज जमा कराने पहुंचे माता-पिता, जवाब सुनकर रह गए हैरान
शब्द गौतम के माता-पिता दो दिन पहले शिमला स्थित खेल विभाग के कार्यालय पहुंचे थे। उनका उद्देश्य बेटे के अंतरराष्ट्रीय खेल प्रमाणपत्र सहित जरूरी दस्तावेज जमा करना था, ताकि भविष्य में सरकारी नौकरी के दौरान उसे 3 फीसदी खेल कोटे का लाभ मिल सके। परिजनों के मुताबिक, उन्हें बताया गया कि स्कूल गेम्स के तहत होने वाली अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप का प्रमाणपत्र मौजूदा नियमों के तहत मान्य नहीं है। परिवार के लिए यह जवाब इसलिए चौंकाने वाला था क्योंकि उनका बेटा देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल चुका है और विश्व चैंपियनशिप में भारतीय टीम की कप्तानी भी कर चुका है।
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चार इंटरनेशनल मुकाबले, एक बार भारत की कप्तानी
शब्द गौतम ने बेहद कम उम्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। वह अब तक चार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इतना ही नहीं, उन्हें भारतीय टीम की कप्तानी करने का मौका भी मिल चुका है। वॉलीबॉल में शब्द लिबरो यानी रक्षात्मक खिलाड़ी के रूप में खेलते हैं और उन्हें अपनी उम्र के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में गिना जा रहा है। अंडर-16 एशियन वॉलीबॉल चैंपियनशिप में वह बेस्ट लिबरो का खिताब भी हासिल कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि जब एक खिलाड़ी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर खेलकर अपनी प्रतिभा साबित कर चुका है, तो उसके प्रमाणपत्र को सरकारी नौकरी के खेल कोटे में मान्यता क्यों नहीं मिल रही?
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नेशनल सर्टिफिकेट मान्य, इंटरनेशनल पर सवाल
इस पूरे मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यही है कि वॉलीबॉल में नेशनल स्तर के प्रमाणपत्र को सरकारी नौकरी के लिए मान्यता मिल रही है, जबकि इंटरनेशनल स्तर पर हासिल प्रमाणपत्र को मान्य नहीं माना जा रहा। यही नियम अब खेल विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाला खिलाड़ी ही अपनी उपलब्धि का लाभ नहीं ले पाएगा, तो प्रदेश की खेल नीति का उद्देश्य आखिर क्या है?
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जानें क्या बोले हिमाचल के खेल मंत्री
मामले पर हिमाचल प्रदेश के खेल मंत्री यादवेंद्र गोमा ने कहा कि मौजूदा पॉलिसी में ओलंपिक, एशियन गेम्स और पैरालंपिक जैसी प्रतियोगिताएं कवर हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में जो संभव होगा, वह किया जाएगा। मंत्री के इस बयान के बाद अब नजर इस बात पर है कि शब्द गौतम जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के लिए सरकार नियमों में कोई रास्ता निकालती है या नहीं।
जिसे हिमाचल ने ठुकराया, उसे दूसरे राज्य में मिला मौका
शब्द गौतम के खेल सफर में यह पहला मौका नहीं है जब उन्हें सिस्टम की अड़चन का सामना करना पड़ा हो। वर्ष 2023 में राज्य के शिक्षा और खेल विभाग की ओर से उन्हें हॉस्टल में प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया था। उस समय उनकी हाइट कम होने को वजह बताया गया था। इसके बाद उनके माता-पिता उन्हें पंजाब के संगरूर स्थित साई हॉस्टल लेकर पहुंचे। वहां ट्रायल के दौरान शब्द के खेल ने चयनकर्ताओं को प्रभावित किया और उनका चयन हो गया। इसके बाद संगरूर हॉस्टल में करीब दो साल तक उन्होंने कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण लिया। आज वही खिलाड़ी भारतीय टीम के प्रमुख लिबरो खिलाड़ियों में शामिल है और देश की टीम की कप्तानी भी कर चुका है।
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प्रतिभा को पहचानने वाली नीति पर ही अब सवाल
शब्द गौतम की कहानी एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर खेल व्यवस्था की तस्वीर भी सामने रखती है। एक तरफ सरकारें युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने और देश के लिए पदक जीतने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, वहीं दूसरी तरफ नियमों की जटिलता के कारण अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ी को ही अपने प्रमाणपत्र की मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
