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August 30, 2026

हिमाचल में गरमाया OPS मुद्दा, 9500 कर्मचारियों ने बुलंद की आवाज; सुक्खू सरकार से मांगेगे पूरा हक

42 महीने इंतजार के बाद टूटा सब्र का बांध सरकार को दे दी चेतावनी

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Sukhu govt OPS

शिमला। हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन योजना यानी OPS का मुद्दा एक बार फिर सियासी रंग लेने लगा है। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश के कर्मचारियों से पुरानी पेंशन बहाल करने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अपना यह चुनावी वादा पूरा करते हुए प्रदेश के बड़ी संख्या में कर्मचारियों को ओपीएस का लाभ बहाल किया। लेकिन अब भी करीब 9500 कर्मचारी ऐसे हैं, जो पुरानी पेंशन योजना के दायरे से बाहर हैं।

 

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ओपीएस का इंतजार कर रहे इन कर्मचारियों की आवाज अब फिर तेज होने लगी है। भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने सुक्खू सरकार से इन कर्मचारियों को भी बिना किसी शर्त ओपीएस के दायरे में लाने की मांग उठाई है। संघ का कहना है कि लंबे समय से इंतजार कर रहे इन कर्मचारियों के साथ पेंशन के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए।

42 महीने से इंतजार, अब सरकार से आर-पार की मांग

बीएमएस के प्रदेश महामंत्री यशपाल हेटा ने आरोप लगाया कि ओपीएस से वंचित कर्मचारी पिछले करीब 42 महीने से अपने हक का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार विधानसभा में प्रदेश के सभी विभागों में ओपीएस लागू होने की बात कह रही है, लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ अलग तस्वीर पेश करते हैं। बीएमएस के मुताबिक प्रदेश में कुल 1,86,436 कर्मचारियों में से करीब 1,17,521 कर्मचारियों को ओपीएस का विकल्प दिए जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में संगठन ने सरकार से सवाल किया है कि बाकी कर्मचारियों की स्थिति क्या है और उन्हें पुरानी पेंशन से बाहर क्यों रखा गया है।

 

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बिजली बोर्ड से लेकर पंचायतों तक कर्मचारी दायरे से बाहर

बीएमएस के अनुसार, ओपीएस से बाहर रहने वाले कर्मचारियों में करीब 6100 बिजली बोर्ड कर्मचारी, 1300 शहरी निकाय कर्मचारी और 2100 पंचायती राज संस्थाओं के कर्मचारी शामिल हैं। संघ का कहना है कि इन कर्मचारियों की एनपीएस के तहत कटौती अभी भी जारी है, जबकि उनके जीपीएफ खाते तक नहीं खोले गए हैं। ऐसे में कर्मचारियों में असमंजस और नाराजगी बढ़ रही है।

‘स्वतंत्र निकाय’ का तर्क भी नहीं आया रास

ओपीएस से बोर्डों और निगमों के कर्मचारियों को बाहर रखने के लिए दिए जा रहे ‘स्वतंत्र निकाय’ के तर्क पर भी बीएमएस ने सवाल उठाया है। यशपाल हेटा का कहना है कि इन संस्थाओं में चेयरमैन, प्रबंध निदेशक और आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति सरकार के स्तर पर होती है। ऐसे में कर्मचारियों को पेंशन के मामले में अलग श्रेणी में रखना उचित नहीं है।

 

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अब सुक्खू सरकार से सीधा सवाल

ओपीएस बहाली को कांग्रेस सरकार की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता रहा है, लेकिन अब करीब 9500 कर्मचारियों का मुद्दा सरकार के लिए नई चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। बीएमएस ने सरकार से मांग की है कि इन कर्मचारियों की एनपीएस कटौती तत्काल बंद की जाए, जीपीएफ खाते खोले जाएं और एनपीएस में जमा राशि को जीपीएफ में स्थानांतरित किया जाए।

 

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इसके अलावा सभी बोर्डों, निगमों, शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में ओपीएस लागू करने के लिए स्पष्ट लिखित आदेश जारी करने और इस व्यवस्था को कानूनी सुरक्षा देने के लिए विधानसभा में कानून बनाने की मांग भी की गई है।

राजनीतिक तौर पर भी अहम हो सकता है मुद्दा

हिमाचल में कर्मचारियों का वोट बैंक चुनावी राजनीति में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में ओपीएस से बाहर रह गए करीब 9500 कर्मचारियों की नाराजगी आने वाले समय में सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी अहम मुद्दा बन सकती है। एक तरफ कांग्रेस सरकार ओपीएस बहाली को अपने प्रमुख चुनावी वादे को पूरा करने के तौर पर पेश करती रही है, वहीं दूसरी तरफ अब वे कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं जिन्हें अभी तक इसका लाभ नहीं मिला है।

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