#अव्यवस्था
August 21, 2026
जागो सुक्खू सरकार! ये स्कूल है या पोल्ट्री फार्म- टपकते टीन की शेड में पढने को मजबूर 22 बच्चे
असुरक्षित भवन के बाद टीन के चार शेड
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कुल्लू: शिक्षा को बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव माना जाता है, लेकिन जिला कुल्लू की तीर्थन घाटी के दूरदराज इलाकों में स्कूल भवनों की बदहाल स्थिति इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। बंजार उपमंडल की ग्राम पंचायत पेखड़ी के राजकीय माध्यमिक विद्यालय नाहीं का भवन असुरक्षित घोषित होने के बाद यहां पढ़ने वाले बच्चों के लिए टीन की चादरों से अस्थायी व्यवस्था की गई है। कड़ाके की ठंड और बारिश के बीच बच्चे इन्हीं शेड में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
स्कूल प्रबंधन समिति के प्रधान सुंदर सिंह के अनुसार, राजकीय माध्यमिक विद्यालय नाहीं वर्ष 2006 में प्राथमिक स्कूल से स्तरोन्नत होकर मिडिल स्कूल बना था। वर्ष 2016 में स्कूल भवन का निर्माण किया गया, लेकिन लगातार प्राकृतिक आपदाओं के कारण इसकी हालत खराब होती चली गई। अब भवन को असुरक्षित घोषित किया जा चुका है।
उन्होंने बताया कि स्कूल भवन की स्थिति को लेकर शिक्षा विभाग को कई बार अवगत करवाया गया, लेकिन नया भवन बनाने या पुराने भवन को हटाने की दिशा में अभी तक ठोस काम नहीं हो पाया है। फिलहाल बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए चार टीन के शेड बनाए गए हैं। इनमें तीन शेड में कक्षाएं चल रही हैं, जबकि एक में स्कूल का कार्यालय संचालित किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्या केवल नाहीं स्कूल तक सीमित नहीं है। पेखड़ी-1 और पेखड़ी-2 प्राथमिक स्कूलों के भवनों की हालत भी चिंताजनक बताई जा रही है। कई जगह भवनों की स्थिति इतनी खराब है कि बच्चों को सुरक्षित तरीके से पढ़ाना मुश्किल हो रहा है।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय पेखड़ी-2 में स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है। स्थानीय निवासी अंजना ठाकुर के अनुसार, स्कूल में केवल एक छोटा कमरा अपेक्षाकृत ठीक हालत में है। इसी कमरे में कार्यालय के साथ पांचों कक्षाओं के बच्चों को बैठाने की व्यवस्था करनी पड़ती है। स्कूल के अन्य दो कमरे भी जर्जर हालत में हैं।
स्कूलों की बदहाल स्थिति का असर अब बच्चों की पढ़ाई और परिवारों पर भी पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बेहतर और सुरक्षित शिक्षा के लिए कई अभिभावक अपने बच्चों को गांव से बाहर शहरों में भेजने को मजबूर हैं। कुछ परिवार किराये के कमरे लेकर बच्चों की पढ़ाई करवा रहे हैं, जबकि दिहाड़ी-मजदूरी करने वाले परिवारों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है।
स्थानीय निवासी गुमत शलाठ उर्फ रवि ने कहा कि यदि समय रहते स्कूलों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई जाती और स्थानीय स्तर पर प्रयास किए जाते तो शायद बच्चों को पढ़ाई के लिए गांव से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी रमेश भारद्वाज ने बताया कि क्षतिग्रस्त प्राथमिक स्कूल भवनों की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। बजट और स्वीकृति मिलने के बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
वहीं, युवा समाजसेवी यज्ञा चंद जुफरा के अनुसार, पिछले महीने उन्होंने उपप्रधान नील चंद के साथ नाहीं स्कूल का दौरा किया था। उस समय स्कूल में पानी की समस्या भी थी, जिसे बाद में हल कर दिया गया। इसके बाद बीपीओ कार्यालय बंजार से जानकारी लेने पर पता चला कि लोक निर्माण विभाग की ओर से सर्वे रिपोर्ट जमा नहीं की गई थी। अब सर्वे रिपोर्ट जमा होने के बाद भवन को गिराने के आदेश जल्द जारी होने की जानकारी मिली है।
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्कूल भवनों की बदहाल स्थिति केवल बुनियादी ढांचे का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बच्चों के शिक्षा के अधिकार से जुड़ा सवाल भी है। एक तरफ सरकार आधुनिक शिक्षा, डिजिटल क्लासरूम और बेहतर सुविधाओं की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में बच्चे टीन की चादरों और जर्जर कमरों के बीच पढ़ने को मजबूर हैं।
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असुरक्षित घोषित भवनों के स्थान पर नए भवनों के निर्माण की प्रक्रिया अगर लंबे समय तक कागजी कार्रवाई और स्वीकृतियों में उलझी रही, तो इसका सीधा असर ग्रामीण बच्चों की शिक्षा पर पड़ेगा। जरूरत है कि ऐसे मामलों में प्रशासन और संबंधित विभाग समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करें, ताकि किसी बच्चे को केवल इसलिए अपने गांव और परिवार से दूर न जाना पड़े क्योंकि उसके स्कूल में सुरक्षित कमरा उपलब्ध नहीं है।