शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी कामकाज पर सवाल उठने लगे हैं, जहां सत्ता बदलने के करीब साढ़े तीन साल बाद भी जयराम ठाकुर की तस्वीर आधिकारिक वेबसाइट से नहीं हटाई जा सकी। इतना ही नहीं इस वेबसाइट पर जयराम ठाकुर ही प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। अब पूरे प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार की यह लापरवाही चर्चा का विषय बन गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपडेट न होने से प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

वर्षों से अपडेट नहीं आधिकारिक वेबसाइट

दरअसल, हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की आधिकारिक वेबसाइट वर्षों से अपडेट नहीं की गई। स्थिति यह है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन को तीन साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन वेबसाइट पर अब भी जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री और गोविंद सिंह ठाकुर को मंत्री के रूप में दर्शाया जा रहा है।

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यह अकादमी, जिसकी स्थापना 1972 में राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी, आज अपनी ही डिजिटल पहचान को अपडेट करने में पिछड़ती नजर आ रही है। वेबसाइट पर न केवल पुराने पदाधिकारियों के संदेश मौजूद हैं, बल्कि पिछले कई वर्षों से कोई नया अपडेट भी दिखाई नहीं देता।

प्रदेश की सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रति उदासीनता

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, साइट पर अंतिम गतिविधि 2021 में आयोजित टांकरी लिपि कार्यशाला से जुड़ी हुई है। इस मुद्दे को लेकर प्रसिद्ध साहित्यकार एस आर हरनोट ने भी चिंता जताई है।

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उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर अकादमी की सामान्य परिषद और संबंधित अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। उनके अनुसार, यह केवल तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।

डिजिटल युग में सूचना का त्वरित और सटीक प्रसार जरूरी

गौरतलब है कि, यह संस्था प्रदेश की लोक कलाओं, भाषाओं और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है। पहाड़ी बोलियों, हिंदी, संस्कृत और उर्दू के संरक्षण से लेकर लोक नृत्य, संगीत और कला को मंच देने तक, अकादमी की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है।

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साथ ही यह संस्था लेखकों को प्रोत्साहित करने, पुस्तकों के प्रकाशन और सांस्कृतिक पुरस्कार प्रदान करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी करती है। इसके बावजूद वेबसाइट का वर्षों तक अपडेट न होना कई सवाल खड़े करता है। डिजिटल युग में जहां सूचना का त्वरित और सटीक प्रसार जरूरी है, वहां ऐसी लापरवाही न केवल संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक छवि को भी प्रभावित करती है।

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