बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर झंडूता विधानसभा के गांव कलोल निवासी 62 वर्षीय सुखदेव, आज अपनी बेबसी से हार मान चुके हैं। कभी शादियों में बाजा बजाकर परिवार का पालन करने वाला यह व्यक्ति अब न जी पा रहा है, न मर पा रहा है। अब मुख्यमंत्री से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाकर उसने सिस्टम की असंवेदनशीलता को आईना दिखा दिया है।

 

हादसा जिसने जिंदगी को लाचार बना दिया


चार साल पहले जुखाला में एक जीप हादसे ने सुखदेव की दोनों टांगें छीन लीं। अब वह न ठीक से बैठ सकता है, न लेट सकता है। खाने तक के लिए दूसरों पर निर्भर है। शरीर पूरी तरह जवाब दे चुका है और सरकारी योजनाएं आज तक उसके दरवाजे तक नहीं पहुंच सकीं।

 

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बेटा मजदूरी करता है, खुद खाना भी नहीं खा पाते


सुखदेव का बेटा मजदूरी करके अपने छोटे परिवार को किसी तरह चला रहा है, लेकिन पिता के इलाज और देखभाल के लिए उसके पास कुछ नहीं बचता। सुखदेव कहते हैं कि घुमारवीं की एक समाज सेवा संस्था के पवन बरूर कुछ समय तक 1000 रुपये महीना देते थे, लेकिन अब वह सहायता भी बंद हो चुकी है।

 

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सरकारी की लापरवाही


गांव में लगे मेडिकल कैंप में जब दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाए जा रहे थे, तब डॉक्टरों ने सुखदेव की गुहार तक नहीं सुनी। पंचायत प्रधान राजकुमार मानते हैं कि सुखदेव को अब तक कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिली, जबकि वह सभी योजनाओं का वास्तविक पात्र है। अब पंचायत ने उसे आईआरडीपी में शामिल करने का आवेदन किया है।

 

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सिस्टम पर निशाना


सुखदेव का मामला हिमाचल के सिस्टम पर सवालिया निशान है। एक व्यक्ति जो पूरी तरह दिव्यांग है, बेसहारा है और सामाजिक मदद से वंचित है, वह आज मुख्यमंत्री से मृत्यु की इजाजत मांग रहा है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है -कहीं हम समाज के सबसे ज़रूरी हिस्से को ही भुला तो नहीं रहे?

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