मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की पवित्र पराशर झील और मंदिर परिसर, जहां ऋषि पराशर ने भगवान विष्णु की आराधना करते हुए साधना की थी, आज मानव लापरवाही और स्वार्थी पर्यटन का शिकार हो चुका है। 15-16 जून को आयोजित सरानाहुली मेले के दौरान यहां लगभग 15,000 श्रद्धालु और टूरिस्ट पहुंचे, लेकिन कई ऐसे भी आए जिन्होंने अपनी मौजूदगी को शर्मनाक यादों में बदल दिया।
मंदिर के पास फेंकी बीयर की बोतलें
मंदिर प्रबंधन के मुताबिक, इस बार टूरिस्टों ने सेनेटरी नेपकिन, बच्चों के डाइपर, शराब और बीयर की बोतलें, यहां तक कि मल से भरी पॉलिथीन तक मंदिर और झील के आसपास फेंक दीं। चौंकाने वाली बात ये है कि यहां कोई होटल या होमस्टे नहीं है, ऐसे में टूरिस्टों ने टेंट लगाकर रुकने के बाद इस इलाके को एक खुले कूड़ाघर में तब्दील कर दिया।
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शुद्धता का प्रतीक टापू भी अब स्थिर हो गया
पराशर झील का वो रहस्यमयी टापू, जो पवित्रता और संतुलन का प्रतीक माना जाता है, अब लगभग 8-9 महीनों से तैरना बंद कर चुका है। स्थानीय गुर भाग सिंह बताते हैं कि कोरोना काल में जब झील में कोई मानवीय हस्तक्षेप नहीं था, तब यह टापू दिन में 6-7 बार एक कोने से दूसरे कोने तक तैरता था। अब ये टापू एक ही जगह अटका हुआ है जो धार्मिक रूप से एक अपशकुन माना जा रहा है।
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पार्टी करने आए थे कुछ लोग
इछनी गांव के धूमल ठाकुर ने 70 युवाओं के साथ ऋषि स्वच्छता सेना बनाई है, जो इस समय पूरे इलाके की सफाई में जुटी है। धूमल ने बताया कि मंदिर और झील से 8 से 10 मीटर की दूरी तक गंदगी फैली है। उन्होंने दावा किया कि 2021 से अब तक 10 लाख से ज्यादा शराब की बोतलें वे इस परिसर से उठा चुके हैं।
प्रशासन की चुप्पी, टूरिज्म की कोई नीति नहीं
पराशर मंदिर क्षेत्र में न तो ठहरने की उपयुक्त व्यवस्था है और न ही सख्त निगरानी। प्रशासनिक उदासीनता ने इस पवित्र स्थल को अनियंत्रित टेंट टूरिज्म का शिकार बना दिया है। ना कोई प्रवेश पंजीकरण, ना कूड़ा निस्तारण व्यवस्था, ना ही जागरूकता।
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आस्था के सवाल, व्यवस्था पर तमाचा
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क्या प्रशासन सिर्फ श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर चुप बैठा है?
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क्या अब देवस्थल टूरिज्म के नाम पर अपवित्र होने के लिए छोड़ दिए जाएंगे?
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क्या धार्मिक स्थलों के लिए अलग से ‘ईको रूल्स’ नहीं बनाए जाने चाहिए?
