#अव्यवस्था
June 2, 2026
सुक्खू सरकार के खिलाफ फूटा अधिवक्ताओं का गुस्सा: सचिवालय का किया घेराव; थमी शहर की रफ्तार
प्रतिभा सिंह की गाड़ी भी रोकी, चालान करने पर अड़े वकील
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला आज वकीलों के प्रचंड गुस्से से उबल पड़ी है। सुक्खू सरकार के खिलाफ अधिवक्ताओं का यह आक्रोश पूरे शिमला शहर पर भारी पड़ गया, जिससे हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल बन गया। सील्ड रोड पर परमिट फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी और पुलिस की कथित सख्ती को लेकर वकीलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अपनी मांगों को लेकर अड़े सैकड़ों अधिवक्ता मंगलवार को सड़कों पर उतर आए और सुक्खू सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। आंदोलनकारी वकीलों ने साफ कर दिया है कि जब तक मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू उनसे सीधे बातचीत नहीं करते, उनका यह हल्लाबोल थमेगा नहीं।
अधिवक्ताओं के इस बड़े आंदोलन की शुरुआत बेहद आक्रामक ढंग से हुई। अपनी नाराजगी और मांगों को मुख्यमंत्री के सामने रखने के लिए बड़ी संख्या में वकील पहले उनके सरकारी आवास 'ओक ओवर' पहुंचे थे। वकीलों को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री उनसे मिलकर समस्या का समाधान निकालेंगे, लेकिन वहां सीएम सुक्खू से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। मुख्यमंत्री के न मिलने से वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और आंदोलन ने और उग्र रूप ले लिया। वहां से भड़के अधिवक्ता रैली निकालते हुए सीधे राज्य सचिवालय की ओर कूच कर गए और सचिवालय का मुख्य द्वार घेरकर बैठ गए।
इस दौरान अधिवक्ताओं ने शिमला के शिल्ली चौक हिमाचल की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का वाहन भी रोक दिया। इस दौरान गुस्साए अधिवक्ता पुलिस से प्रतिभा सिंह के वाहन का चालान करने पर अड़ गए। अधिवक्ताओं की जिद के आगे पुलिस को भी झुकना पड़ा और पुलिस ने प्रतिभा सिंह की गाड़ी का 1500 का चालान काट दिया।

सचिवालय के बाहर जमा हुए सैकड़ों अधिवक्ताओं ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस दौरान पूरा सचिवालय परिसर "वीआईपी कल्चर नहीं चलेगा" और "अंग्रेजों के कानून नहीं चलेंगे" जैसे गगनभेदी नारों से गूंज उठा। प्रदर्शनकारियों का सीधा आरोप है कि सुक्खू सरकार जनभावनाओं की अनदेखी कर रही है और तानाशाही रवैया अपना रही है। वकीलों ने सचिवालय के बाहर मुख्य सड़क पर ही धरना शुरू कर दिया है। मौके की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया है, लेकिन वकील अपनी जिद पर अड़े हुए हैं।
दरअसल, वकीलों के इस गुस्से की मुख्य वजह प्रदेश सरकार द्वारा बजट सत्र के दौरान शिमला की सील्ड रोड को लेकर नियमों में किया गया बड़ा बदलाव है। सरकार ने सील्ड रोड पर वाहनों की परमिट फीस को कई गुना बढ़ा दिया है। जो वार्षिक शुल्क पहले मात्र 2,500 रुपए था, उसे सीधे बढ़ाकर 10,000 रुपए कर दिया गया है। इसी तरह दैनिक परमिट को 200 रुपए से बढ़ाकर 1,000 रुपए और प्रोसेसिंग फीस को 100 रुपए से बढ़ाकर सीधे 10,000 रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा बिना परमिट गाड़ी पकड़े जाने पर 10,000 रुपए के भारी-भरकम चालान का प्रावधान भी किया गया है।

अधिवक्ताओं का कहना है कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंचने के लिए बड़ी संख्या में वकील इसी मार्ग का उपयोग करते हैं। ऐसे में नई व्यवस्था उनके पेशेवर कार्यों को प्रभावित करेगी। उनका तर्क है कि वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के बदल दिया गया है।
वकीलों द्वारा सचिवालय के बाहर सड़क पर धरना दिए जाने का सबसे घातक असर शिमला की लाइफलाइन कही जाने वाली 'सर्कुलर रोड' पर पड़ा। यातायात व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई और सड़क के दोनों ओर वाहनों की किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। दोपहर के समय जब स्कूलों की छुट्टी हुई, तो स्थिति और बदतर हो गई। छोटे-छोटे स्कूली बच्चे, उनके अभिभावक, दफ्तरों से निकलने वाले कर्मचारी और देश-विदेश से आए पर्यटक घंटों तक इस महाजाम में फंसे रहे।
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प्रदर्शनकारी अधिवक्ताओं की मुख्य मांग है कि सील्ड रोड को लेकर पहले से लागू व्यवस्था को बरकरार रखा जाए और परमिट शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी को वापस लिया जाए। उनका कहना है कि अधिवक्ताओं और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों के लिए विशेष व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि न्यायिक कार्य प्रभावित न हों। अधिवक्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।