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June 7, 2026
सुक्खू सरकार नहीं कर पा रही CBSE स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती, छात्रों की बढ़ी चिंता; सैकड़ों ने छोड़े स्कूल
सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती पर फंसा पेंच, कैबिनेट में भी नहीं हुआ हल
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से सुक्खू सरकार ने 150 से अधिक सरकारी स्कूलों को हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड से सीबीएसई पाठ्यक्रम में परिवर्तित तो कर दिया, लेकिन अब इन स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता सरकार के लिए नई चुनौती बनती जा रही है।
प्रदेशभर के हजारों विद्यार्थी और उनके अभिभावक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आखिर इन स्कूलों में योग्य शिक्षकों की नियमित तैनाती कब होगी। स्थिति यह है कि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया बार-बार अटकने के कारण कई विद्यार्थियों ने सीबीएसई स्कूलों से नाम वापस लेकर दोबारा एचपी बोर्ड से संबद्ध स्कूलों का रुख कर लिया है। शिक्षा विभाग के आंकड़े भी इस चिंता को और मजबूत करते हैं।
प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान चरणबद्ध तरीके से 158 सरकारी स्कूलों को सीबीएसई से संबद्ध किया। सरकार का उद्देश्य था कि सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी भी राष्ट्रीय स्तर के पाठ्यक्रम का लाभ उठा सकें और प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी कर सकें।
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लेकिन स्कूलों के सीबीएसई में बदलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती प्रशिक्षित शिक्षकों की तैनाती बन गई। इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए हजारों शिक्षकों की नियुक्ति का खाका तैयार किया गया, स्क्रीनिंग टेस्ट भी आयोजित किए गए और मेरिट सूची भी जारी हुई, लेकिन अंतिम नियुक्तियां अब तक अधर में लटकी हुई हैं।
शनिवार को हुई मंत्रिमंडल बैठक में सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति का मुद्दा प्रमुखता से उठा। मेरिट के आधार पर शिक्षकों की तैनाती को लेकर कई मंत्रियों ने अलग-अलग सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराईं। इसके बाद सरकार कोई अंतिम निर्णय नहीं ले सकी और मामला एक उच्चस्तरीय कमेटी को सौंप दिया गया। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी में कई वरिष्ठ मंत्रियों को शामिल किया गया है। अब यही कमेटी तय करेगी कि सीबीएसई स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति केवल मेरिट के आधार पर होगी या कोई दूसरा मॉडल अपनाया जाएगा।
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सरकार ने प्रदेशभर के 158 सीबीएसई स्कूलों में 5623 सेवारत शिक्षकों को नियुक्त करने की योजना बनाई थी। इसके लिए स्क्रीनिंग टेस्ट आयोजित किया गया था, जिसमें लगभग 9821 शिक्षकों ने भाग लिया। इनमें से 6084 शिक्षक मेरिट सूची में शामिल हुए। शिक्षा विभाग ने काउंसलिंग कार्यक्रम भी घोषित कर दिया था, लेकिन बाद में इसे स्थगित कर दिया गया। इसके बाद से पूरी प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है। ऐसे में हजारों शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही असमंजस की स्थिति में हैं।
जानकारों का मानना है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या बड़े पैमाने पर होने वाले तबादले हैं। यदि 5623 शिक्षकों को सीबीएसई स्कूलों में भेजा जाता है तो उतने ही शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित करना पड़ेगा। प्रदेश के कई प्रमुख और शहरी क्षेत्रों के स्कूलों को सीबीएसई से जोड़ा गया है। ऐसे में पसंदीदा स्कूलों में तैनाती को लेकर भी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। यही कारण है कि पूरा मामला लगातार उलझता जा रहा है।
शिक्षकों की कमी और अन्य व्यवस्थागत चुनौतियों के बीच इस वर्ष 438 विद्यार्थियों ने सरकारी सीबीएसई स्कूलों से नाम कटवाकर दोबारा एचपी बोर्ड से संबद्ध विद्यालयों में प्रवेश ले लिया है। हालांकि शिक्षा विभाग का दावा है कि कुल मिलाकर सीबीएसई स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जिन स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और विषय विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होंगे, वहां छात्रों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
सीबीएसई पाठ्यक्रम को चुनने वाले अधिकांश अभिभावकों की अपेक्षा रहती है कि उनके बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अंग्रेजी माध्यम का वातावरण और प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप शिक्षण मिले। लेकिन यदि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक ही उपलब्ध नहीं होंगे तो इन अपेक्षाओं पर असर पड़ना स्वाभाविक है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों का भविष्य किसी प्रशासनिक प्रक्रिया में नहीं उलझना चाहिए। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आने वाले शैक्षणिक सत्रों में दाखिले भी प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार ने सीबीएसई स्कूलों का विस्तार तो कर दिया है, लेकिन अब सबसे बड़ी परीक्षा इन स्कूलों को पर्याप्त और योग्य शिक्षक उपलब्ध कराने की है। यदि नियुक्तियों को लेकर लगातार देरी होती रही तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई, परीक्षा परिणामों और भविष्य पर पड़ सकता है।